Vernacular Names
Assamese
Gavadani
Bengali
Rakhal
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🌱 Plant Information
Etymology
| Sanskrit Synonym | Sanskrit (Diacritical) | Reference | Etymology (Sanskrit) | English Meaning |
|---|---|---|---|---|
| इन्द्रवारुणी | Indravāruṇī | इन्द्रा शक्तिसंपन्ना वारुणी जलरेचनी । | ||
| इन्द्रवल्लरी | Indravallarī | महती वल्लरी लता। | ||
| गवाक्षी | Gavākṣī | गां भूमिमक्ष्णोति व्याप्नोति, विस्तृतत्वात्; गोरक्षिवत् फलानि चास्याः । | ||
| गवादनी | Gavādanī | वोभिरद्यत इति । | ||
| चित्रा | Citrā | चित्रं चित्रितं फलमस्याः । | ||
| पीतपुष्पी | Pītapuṣpī | पीतं पुष्पमस्याः । | ||
| मरुसम्भवा | Marusambhavā | मरुप्रदेशे जाता । | ||
| मृगैर्वारुः | Mṛgairvāruḥ | मृगाणामेर्वारुः कर्कटी, तैर्भक्ष्यमाणत्वात् । | ||
| वारुणी | Vāruṇī | जलरेचनी । | ||
| विषघ्नी | Viṣaghnī | विषं हन्ति । |
Classifications
Properties
Classical Verses Related to Therapeutic Indications
| Vyadhi / Diseases | Context / Formulation | Shloka / Verse | Reference |
|---|---|---|---|
| कामला | हिता गवाक्षी सगुडा च शुण्ठी | (सु. उ. ४४. ३०) | |
| णसंशोधन | अजगन्धाऽजश्रृंगी च गवाक्षी लांगलाह्रया। पूतीकश्र्चित्रक: पाठा विडंगैलाहरेणव:॥ कटुत्रिकं यवक्शारो लवणानि मन:शिला॥ कासीसं त्रिवृता दन्ती हरितालं सुराष्ट्रजा। संशोधनीनां वर्तीनां द्रव्याण्येतानि निर्दिशेत्। | (सु. सू ३७ १३-१४) | |
| शाल्यापनयन | व्रणपर्यन्त्तालेपान मूलं जलपिष्टं शक्रवारुण्या:। कर्षति नष्टं शल्यम् | (रा. मा २६. १२) | |
| कुरण्ड | वातरितैलमृदितं सुरवारुणीजं मूलं नर: पिबति यो मसृणं विचूर्ण्य। गव्ये निधाय् पयसि त्रिदिनावसाने तस्य प्रणश्यति कुरण्डभवो विकार:॥ | (रा. मा. १७ ५; च. द. ४० १९) | |
| चर्मकील | सुरेन्द्रवारुणीमूलं वृषमूत्रेण पेषितम्। चर्मकीलान्निहन्त्याशु प्रलेपात् साधनोद्भवान्॥ | (रा. मा. १७.२) | |
| इन्द्रलुप्त | मूलं शक्रसुराया: गोमूत्रे संस्थितं त्र्यहम् क्लिनम्। शमयति सुरेशलुप्तं गोमयघृतप्रलेपेन्॥ | (ग. नि. ३. १ ७७) | |
| पालित्य | इन्द्रवारुणिकाबीजतैलेनाभ्यडमाचरेत्। प्रत्यहं तेन जायन्ते कुन्तला: भृडसन्निभा:॥ | (शा. सं ३. ११. २६) | |
| सन्धिवात | इन्द्रवारुणिमूलं मागधीगुडसंयुतम्। भक्षयेत् कर्षमात्रं तु सन्धिवातं व्यपोहति॥ | (भा. प्र. चि. २४. २५९) | |
| गण्डमाला | …………ऎन्द्रया वामूलं गोमूत्रयोगत:। गण्डमालां हरेद घोरा चिरकालोत्थितामपि॥ | (च. द. ४१. २१) | |
| गण्डमाला | पिष्ट्वा तण्डुलतोयेन घृतमात्रपरिप्लतम्। मूलं तु शक्रवरुण्या गण्डमालापहं पिबेत्॥ | (ग. नि, ४. १. ४२) | |
| गर्भपातनार्थ | मूलं गवाक्ष्या: स्मरमन्दिरस्थं पुष्पावरोधस्य वधं करोति। अभर्तृकानां व्यभिचारिणीनां योगोऽयमेव द्रुतगर्भपाते॥ | (वै. जी ३. ३६) | |
| योनिद्रावणार्थ | इन्द्रवारुणिकापत्ररसै: सूतं विमर्दयेत् रक्तस्य करवीरस्य काष्ठेन च मुहर्मुह:॥ तल्लिप्तलिडसंयोगाद योनिद्रावो ऽभिजायते॥ | (शा. सं. ३. ११. १६-१७) | |
| उन्माद | ब्रह्राराक्षसनिन्नस्य पक्वैन्द्रीफलमूत्रजम्॥ | (च. द. २० ५०) |