Vernacular Names
Amlakhu, Amlakhi, Amlaku
Amla
Emblic Myrobalan
Ambala, Amala
Amla, Aonla
Nellikayi
Anvala, Avalkathi
Anala, Ainla
Aula, Amla
Āmalaka, Amr̥taphala, Dhātrīphala
Nellikkai, Nelli
Usirika
Amla, Amlaj
Relational Concept Map
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🌱 Plant Information
Etymology
| Sanskrit Synonym | Sanskrit (Diacritical) | Reference | Etymology (Sanskrit) | English Meaning |
|---|---|---|---|---|
| आमलकी | Āmalakī | आमलते धारयति शरीरम्, ‘मल धारणे’; अथवा अमला एव आमलकी, दोषशमनत्वातः अथवा अम्लत्वैवशेष्यात्, यथोक्तं प्रियनिघण्टौ- | ||
| अमला | Amalā | न मलं तिष्ठत्यनया । | ||
| अमृतफलम् | Amṛtaphalam | अमृतवद् रसायनं फलमस्याः । | ||
| अमृता | Amṛtā | अमृतवद् गुणकारिणी, रसायनत्वात्, न म्रियन्ते जना अकाले यस्या सेवनेनेत्यर्थः । | ||
| कोरङ्गका | Koraṅgakā | कोरङ्गदेशे भवा । | ||
| कोलम् | Kolam | कोलपरिमाणं फलमस्य । | ||
| जातीफलरसम् | Jātīphalarasam | जाती प्रशस्तः फलरसोऽस्य । | ||
| तिष्यफला | Tiṣyaphalā | तिष्ये पौषमासे फलं जायतेऽस्याः तिष्यं माङ्गल्यं फलमस्या इति रामाश्रमी । | ||
| धात्री | Dhātrī | धात्रीव देहस्य धारणपोषणकरी; स्तन्यमिव फलरसो पीयतेऽस्याः, ‘धेट् पाने’ । | ||
| वयःस्था | Vayaḥsthā | वयस्तरुणं स्थापयतीति, वयःस्थापनीत्यर्थः। | ||
| वयस्या | Vayasyā | वयसे आयुषे हिता, आयुष्येत्यर्थः । | ||
| वृत्तफला | Vṛttaphalā | वृत्तं फलमस्याः । | ||
| वृष्या | Vṛṣyā | शुक्रवर्धनी । | ||
| शिवम् | Śivam | कल्याणकारि । | ||
| शीतफलम् | Śītaphalam | शीतवीर्यं फलम् । | ||
| षड्रसा | Ṣaḍrasā | षड्रसाः सन्त्यस्याम् । |
Classifications
| Name | उपयोगी हिस्सा(हिन्दी) | Part Used(Diacritical) | Title (Ref. Book) | Reference Remarks |
|---|---|---|---|---|
| Fruit | फल | Phala |
| Name | गण(हिन्दी) | Gana(Diacritical) | Title (Ref. Book) | Reference Remarks |
|---|---|---|---|---|
| त्रिफला | Triphalā | Triphala | ||
| परूषकादिगण | Parūṣakādigaṇa | Parushakadigana |
| Name | महाकषाय (हिन्दी) | Mahakashaya(Diacritical) | Title (Ref. Book) | Reference Remarks |
|---|---|---|---|---|
| Vayahsthapana Mahakashaya | वयःस्थापन महाकषाय | Vayaḥsthāpana mahākaṣāya | ||
| Virechanopaga Mahakashaya | विरेचनोपग महाकषाय | Virecanopaga mahākaṣāya |
| Name | वर्ग(हिन्दी) | Varga(Diacritical) | Title (Ref. Book) | Reference Remarks |
|---|---|---|---|---|
| Amradivarga | आम्रादिवर्ग | Āmrādivarga | ||
| Guduchyadivarga | गुडूच्यादिवर्ग | Guduchyadivarga | ||
| Guduchyadivarga | गुडूच्यादिवर्ग | Guduchyadivarga | ||
| Oshadhivarga | ओषधिवर्ग | Oṣadhivarga |
Properties
| Name | रस (हिन्दी) | Rasa (Diacritical) | Title (Ref. Book) | Author (Ref. Book) | Publisher (Ref. Book) | Reference Remarks |
|---|---|---|---|---|---|---|
| Amla | अम्ल | Amla | ||||
| Kashaya/Tuvara | कषाय/तुवर | Kaṣāya/Tuvara | ||||
| Madhura/Svadu | मधुर/स्वादु | Madhura/Svādu | ||||
| Tikta | तिक्त | Tikta | ||||
| Katu/Ushana | कटु/उषण | Kaṭu/Uṣaṇa |
| Name | गुण(हिन्दी) | Guna(Diacritical) | Title (Ref. Book) | Reference Remarks |
|---|---|---|---|---|
| Ruksha | रुक्ष | Rukṣa |
| Name | विर्य (हिन्दी) | Virya (Diacritical) | Title (Ref. Book) | Reference Remarks |
|---|---|---|---|---|
| Shita Virya | शीत वीर्य | Śīta vīrya |
| Name | विपाक (हिन्दी) | Vipaka(Diacritical) | Title (Ref. Book) | Reference Remarks |
|---|---|---|---|---|
| Madhura vipaka | Madhura vipāka | मधुर विपाक |
| Name | कर्म (हिन्दी) | Karma (Diacritical) | Title (Ref. Book) | Reference Remarks |
|---|---|---|---|---|
| Anulomana | अनुलोमन | anulomana | ||
| Dipana | दीपन | dīpana | ||
| Hridya/ Hridayam (Saumanasyakara) | हृद्य/ हृदयं (सौमनस्यकर) | hṛdya/ hṛdayaṃ (saumanasyakara) | ||
| Jvarahara | ज्वरहर | jvarahara | ||
| Keshya/ Keshavardhaka | केष्य/ केशवर्धक | keṣya/ keśavardhaka | ||
| Kushthaghna/ Kushthahara | कुष्ठघ्न/ कुष्ठहर | kuṣṭhaghna/ kuṣṭhahara | ||
| Medhya/ Medhakara/ Medhavardhaka | मेध्य/ मेधाकर/ मेधावर्धक | medhya/ medhākara/ medhāvardhaka | ||
| Mutrajanana/ Mutrala/ Mutravirechaniya | मुत्रजनन/ मूत्रल/ मुत्रविरेचनीय | mutrajanana/ mūtrala/ mutravirecanīya | ||
| Pramehaghna | प्रमेहघ्न | pramehaghna | ||
| Shonitasthapana | शोणितस्थापन | śoṇitasthāpana | ||
| Tridoshahara/ Tridoshaghna | त्रिदोषहर/ त्रिदोषघ्न | tridoṣahara/ tridoṣaghna | ||
| Vrishya | वृष्य | vṛṣya | ||
| Rasayana | रसायन | rasāyana | ||
| Chakshushya | चक्षुष्य | cakṣuṣya |
| Name | दोषकर्म (हिन्दी) | Doshakarma (Diacritical) | Title (Ref. Book) | Reference Remarks |
|---|---|---|---|---|
| Tridoshahara/ Tridoshashamana | त्रिदोषहर/ त्रिदोषशमन | Tridoṣahara/ Tridoṣaśamana |
Usage
| Name | Dosage(Form) | Dosage(Reference) | Title (Ref. Book) | Reference Remarks |
|---|---|---|---|---|
| Triphala Churna | Churna | Ayurvedic Formulary of India (AFI), Part I, 7:15 | ||
| Dhatryadi Ghrita | Ghrita | Ayurvedic Formulary of India (AFI), Part I, 6:21 | ||
| Dhatri Lauha | Lauha | Ayurvedic Formulary of India (AFI), Part I, 21:2 | ||
| Dhatakyadi Churna | Churna | Ayurvedic Formulary of India (AFI), Part III, 6:21 | ||
| Chyavanaprasha | Avaleha/Leha/Paka | Ayurvedic Formulary of India (AFI), Part I, 3:11 | ||
| Brihacchagaladya Ghrita | Ghrita | Ayurvedic Formulary of India (AFI), Part II, 6:3 | ||
| Amalakyadi Churna | Churna | Ayurvedic Formulary of India (AFI), Part I, 7:3 |
| Name | Title (Ref. Book) | Reference Remarks |
|---|---|---|
| Kāsa | ||
| Agnimāndya | ||
| amlapittam | ||
| Arśa | ||
| aruciḥ | ||
| daurbalyam | ||
| hṛdrogaḥ | ||
| pramehaḥ | ||
| raktapittam | ||
| Śotha | ||
| Svasa | ||
| vibandha |
Dose
| Name | Title (Ref. Book) | Reference Remarks |
|---|---|---|
| Svarasa/ Juice-10-20ml | ||
| Powder/ Curna- 3-6gm | ||
| Powder/ Curna- 3-6gm | ||
| Svarasa/ Juice-10-20ml |
Pharmacopoeial Status
| Name | Title (Ref. Book) | Reference Remarks |
|---|---|---|
| The Ayurvedic Pharmacopoeia of india, Part-I, Vol.-I, Pg. No. 05 (Dried fruit) | ||
| The Ayurvedic Pharmacopoeia of india, Part-I, Vol.-I, Pg. No.04 (Fresh fruit) |
Classical Verses Related to Therapeutic Indications
| Vyadhi / Diseases | Context / Formulation | Shloka / Verse | Reference |
|---|---|---|---|
| ज्वर | रसमामलकानां वा घृतभृष्टं ज्वरापहम्॥ | (च. चि. ३. २३०) | |
| ज्वर | अस्वेदनिद्रस्तृष्णार्त: पिबेत् पेया सशर्कराम्। नागरामलकै: सिद्दं घृतभृष्टां ज्वरापहाम्॥ | (च. चि. ३. १८७) | |
| दीपनार्थ | अंगारपाकपचितानि फलानि धाञ्या: आज्येन जीरलवणेन विमिश्रितानि। बाह्राकधूमपरिथूपितसौरभाणि संधुक्षयन्ति जठरानलमुदतानि॥ | (क्षे. कु. ८. ६४; ११, २७) | |
| अर्श | फलारिष्ट | (च. चि.१४, १४८-५२) | |
| अर्श | कनकारिष्ट | (च. चि. १४. १४८- ६८) | |
| अर्श | काश्मार्यामलकानां………….. दग्ध: सरेण सिद्दान दघाद रक्ते प्रव्रुत्तेऽति॥ | (च. चि. १४. २०२) | |
| अर्श | एष एव… आमलकगुडुचीषु तक्रकल्प:॥ | (सु. चि. ६. १३) | |
| क्रिमिरोग | क्षौद्रेण लीढवाऽनुपिबेद् रसमामलकोद्भवम्॥ अक्षाभयारसं वापि | (सु. उ. ५४, ३१) | |
| पाण्डुरोग | धात्रीफलानां रसमिक्षुजञ्च मन्थं पिबेत क्षौद्रयुतं हिताशी । | (सु. उ. ४४. १८) | |
| पाण्डुरोग | धात्रीफलं वा मधुनाऽवलिह्यात्॥ | ( सु. उ. ४४. २७) | |
| कामला | धात्र्यवलेह: | (च. चि. १६- १००-१०१) | |
| धात्र्यरिष्ट | (च. चि. १६, १११-१३) | ||
| ………. पानाहारे प्रशस्यते॥….कामलार्तानां मृद्वीकामलकीरस:॥ | (च. चि. १६. ११४) | ||
| रक्तपित्त | …………………..आमलकानि वा। विरेचनं प्रयुञ्जीत प्रभूतमधुशर्करम्॥ रस: प्रशस्यते तेषां रक्तपित्त विशेषत:॥ | (च. चि. ४. ५७-५८) | |
| रक्तपित्त | नासाप्रवृत्तरुधिरं घृतभृष्टं श्र्लक्ष्णपिष्टमामलकम्॥ सेतुरिव तोयवेगं रुणद्दि मूर्घ्नि प्रलेपेन॥ | (वृ. मा. ९. ३०; शा. सं ३. ११. ६१) | |
| स्वरभेद | अभिलषति विजेतु य: स्वरस्य प्रणाशं स पिबतु सह दुग्धेनामलक्या: फलं वा। | (रा. मा. १०.३) | |
| स्वरभेद | पिप्पलीमधुयुक्तो वा रसो धात्रीकपित्थयो:॥ | (च. चि. १७. १३५) | |
| कास | चूर्ण पिबेदामलकस्य वापि क्षीरेण पक्वं सघृतं हिताशी। | (सु. उ. ५२. ३६; अ. ह चि. ३. ७८) | |
| मूर्च्छा | हरीतकीक्वाथश्रृतं घृतं वा धात्रीफलानां स्वरसै: कृतं वा॥ | (सु. उ. ४६. १९) | |
| मूर्च्छा | स्विन्नमामलकम् पिष्ट्वा द्राक्षया सह संसृजेत्॥ विश्वभेषजासंयुक्तं मधुना सह लेहयेत्॥ तेनास्य शाम्यते मूर्च्छा श्वास: कासस्तथैव च। | (बं. से.मूर्च्छा, ३५; भा. प्र. चि. १. ५६२) | |
| ह्रद्रोग | प्राशं तथागस्त्यमश्र्चापि लेहं रसायनं ब्राह्रामथामलक्या:॥ | (च. चि. २६; ९९) | |
| छर्दि | धात्रीरसेन शीतं वा पिबेन मुदगदलाम्बु वा॥(अ. सं. चि. ८. १५) पिष्ट्वा धात्रीफलं द्राक्षां शर्कराञ्च पलोन्मिताम्। दत्वा मधुपलञ्चैव कुडवं सलिलस्य च। वाससा गालितं पीतं हन्ति छर्दि त्रिदोषजाम्। | (ब. से. छर्दि. ३७; भा. प्र. चि.२७. २०) | |
| तृष्णा | गण्डूषमम्लैर्विरसे च वक्त्रे कुर्याच्छुभैरामलकस्य चूर्णै:। | (सु. उ. ४८. १७) | |
| दाह | इक्षुदकैरामलकीरजांसि त्रिसप्तधा साधु विभावितानि। प्रातर्निपानि सितापयोभिर्महान्तमन्तर्दवथु हरन्ति॥ | (सि. भे. ४. ४४३) | |
| अम्लपित्त | धात्रीशतावीक्षौद्रं तुल्यं शर्करया समम॥ लिहेदत्रानुपानेन पयसाऽथ घृतेन च॥ अम्लपित्तं निहन्त्याशु वलीपलितनाशनम्। चक्षुष्यमायुष्यतमं चतु: सममुदाहतम्॥ | (बं. से अम्लपित्त ४९ ; भा. प्र १० १९) | |
| उदावर्त्त (मूत्रज) | धात्रीफलानां स्वरसं सजलं वा पिबेत त्र्यहम्॥ | (सु. उ. ५५. २२) | |
| शूल | प्रलिह्यात पित्तशूलघ्नं धात्रूर्ण समाक्षिक॥ | (वृ. मा. २६. २५) | |
| शूल | धात्र्या रसं विदायां वा त्रायन्तीगोस्तनाम्बुना। पिबेत् सशर्कर. सघ: पित्तशूलनिषूदनम्। धात्रीफलभवं चूर्णमयशूर्णसमायुतम्। यष्टीचूर्णेन वा चुके लिहयात क्षीद्रेण तद्गदे॥ | (बं. स. परिणामशूल, ९५ भा. प्र. चि. ३०. ७८) | |
| कुष्ठ | य: प्रातरामलकनिम्बदलानि लढि चूर्णीकृतान्यनुदिनं प्रविमुक्ततन्द्र:। शीर्णाघ्रिपाणिरवगाढतोऽपि कुष्ठरोगेण कैरपि दिनै: प्रविमुच्यतेऽसौ॥ | (रा. मा. ८. १) | |
| कुष्ठ | धात्रीखदिरयो: क्वाथं पीत्वाऽवल्गुजसंयुतम्॥ शंखेन्दुधवलं श्र्वित्रं तूर्ण हन्ति न संशय:॥ | (वृ. मा. ५१. ३४) | |
| वातरक्त | आमलकहरिद्राकषायं मधुमधुरं पाययेत्॥ | (सु. चि. ४. १०) | |
| वातरक्त | सर्वेषु च पुराणघृतमामलकरस्विपक्वं वा पानार्थे॥ | (सु. चि. ५. १२) | |
| विसर्प | रसमामलकानां वा घृतमिश्रं प्रदापयेत्॥ स एव गुरुकोष्ठाय त्रिवृच्चूर्णयुतो हित:॥ | (च. चि. २१. ६७. वृ. मा. ५४ ३) | |
| जालकगर्दभ | धात्रीप्रयोगान् शिशिरान् प्रदेहान् कुर्यात सदा जालकगर्दभस्य। | (च. चि. १२. १०० अ ह्र उ. ३२ ६) | |
| जालकगर्दभ | जालकगर्दभे धात्रीफलान्युपयुञ्जीत। | (अं. सं उ. ३७.८) | |
| मसूरिका | धात्रीफलं सम्धुकं क्वथितं मधुसंयुतम्॥ मुखे कण्ठे व्रणे जाते गण्डूषार्थ प्रशस्यते। | (भा. प्र. चि. ६०. ५०) | |
| व्यड्ग | तेनैव (अजाक्षीरेणैव) बालामलकं गोमूत्रेण सप्ताहं स्थितम्॥ | (अ. सं उ. ३७. २४) | |
| पलित | लोहमलामलकल्कै: सजपापुष्पै: नर: सदास्नायी। पलितानीह न पश्यति गंगास्नायीव नरकाणि॥ | (वृ. मा. ५७ ९१) | |
| प्रमेह | मेहेषु धात्रीनिशे॥ | (अ. ह्र. उ. ४० ४८) | |
| प्रमेह | स्निग्धं वान्तं विरिक्तञ्च निरुढं पाययेत् रसम्॥ धात्र्या: सर्वप्रमेहेषु निशाक्षीद्रसमन्वितम्॥ | (वृ. मा. ३५. १६; सु. चि. ११. ८) | |
| मूत्राधाते | अथवा क्षौद्रसंयुतम् । प्रपीडयामलकानां तु रसं कुडवसम्मितम्॥ पीत्वाऽगदौ भवेञ्जतुर्मूत्रदोषरुजातुर:॥ | (सु. उ. ५८. ३९. ४०) | |
| मूत्राधाते | धात्रीफलरसेनैवं सूक्ष्मैलां वा पिबेन्नर:। | (सु. उ. ५८. ४९) | |
| मूत्राधाते | गुडेनामलकं वृष्यं श्रमघ्नं तर्पण प्रियम। पित्तासुग्दाहशूलघ्नं मूत्रकृच्छ्रनिवारणाम्। | (वृ. मा. ३२. ८) | |
| मूत्राधाते | धात्रीरसं चेक्षुरसं पिबेद् वा कृच्छ्रे सरक्ते मधुना विमिश्रम्॥ | (भा. प्र. चि. ३५. ३२) | |
| नेत्ररोग | वृक्षस्थिताद विगलितो नखभेदनेन धात्रीफलाद् विदलितात् परिपूर्णरुपात्। रोगान रसो हरति लोचनयो: प्रभूतान् दोषै: कृतान पवनपित्तकफै: प्रदुष्टै:॥ | (रा. मा. ३. १०) | |
| नेत्ररोग | धात्रीरसाञ्जनक्षौद्रसर्पिर्भिस्तु रसक्रिया। पित्तानिलाक्षिरोगघ्नी तैमिर्यपटलापहा॥ | (च. च. २६. २६०. वृमा. ६१. १७२) | |
| नेत्ररोग | पत्रं फलं चामलकस्य पक्त्वा क्रियां विदध्यादथवाऽञ्जनार्थे। | (सु. उ. १२. ४१) | |
| नेत्ररोग | धात्रीफलनिर्यास: नवट्टक्कोपं निहन्ति पूरणत:। | (बं. से. नेत्ररोग ३४) | |
| व्याधिप्रतिषेध | भिल्लोटककषायेण तथैवामलकस्य वा। प्रक्षालयेन मुखं नेत्रे स्वस्थ: शीतोदकेन वा। नीलिका मुखशोषञ्च पिडकां व्यड्मेव च। रक्तपित्तकृताअ रोगान सघ एव विनाशयेत्॥ | (सु. चि. २४. १५. १६) | |
| मेघावर्धनार्थ | तिलधात्रीफलचूर्ण समधुघृतं प्रगे लीढम्। जनयेन मासेन मतिं महती हन्याज्जराश्र्च पराम्॥ | (वै. म. २०. ५. १५) | |
| रसायन | आमलकरसायनम् | (च. चि. १. २. ८. च. चि. १. १ ५८-१४; १ २ ४-१०; १ ३ ९-१३) | |
| रसायन | मध्वामलकचूर्णानि सुवर्णमिति च त्रयम्॥ प्राश्यारिष्टगृहीतोऽपि मुच्यते प्राणसंशयात्॥ | (सु. चि. २८ २०) | |
| रसायन | वयस: स्थापने धात्री। | (अ. ह्र. उ. ४० ५६) | |
| रसायन | धात्रीरसक्षौद्रसिताघृतानि हिताशनानां लिहतां नराणाम्। प्रणाशमायान्ति जराविकारा ग्रन्था विशाला इव दुर्गृहीता:॥ | (अ. ह्र. उ. ३१. १४९) | |
| रसायन | धात्रीकृमघ्नासनसारचूर्ण सतैलसर्पिर्मघुलोहरेणु॥ निषेवमाणस्य भवेन्नरस्य तारुण्यलावण्यमविप्रणष्टम्॥ | (अ. ह्र. उ. ३९. १५०) | |
| रसायन | धात्रीतिलान् भृंगरजोविमिश्रान् ये भक्षयेयुर्मनुजा: क्रमेण। ते कृष्णकेशा: विमलेन्द्रियाश्र्च निर्व्याधयोऽप्यामरणाद् भवेयु:॥ | (वृ. मा. ६९. ११) | |
| रसायन | आमलकीरसायन | (वृ. मा. ६९. १९) | |
| वाजीकरण | एवमालकं चूर्ण स्वरसेनैन भावितम्। शर्करामधुसर्पिर्भियुक्तं लौढवा पय: पिबेत्॥ एतेनाशीतिवर्षोऽपि युवेव परिहष्यति॥ | (सु. चि. २६. २४: वृ. मा. ७० ८-९) | |
| प्रदर | जलेनामलकीबीजकल्कं वा ससितमधूम। मधूनामलकाच्चूर्ण रसं वा लेहयेच्च ताम्॥ | (च. चि. ३०. ११७) | |
| प्रदर | जलेनामलकीबीजंकल्कं समधुशर्करम्॥ पिबेद दिनत्रयेणेव श्वेतप्रदनाशनम्॥ | (भा. प्र. चि. ६९. १०) | |
| प्रदर | धात्र्यस्थि तण्डुलजलै: पीतं हन्यादसृग्दरम्॥ पीता शीताम्बुना पिष्टा धात्री वोदुम्बराम्बुना॥ | (वै. म. २.९) | |
| प्रदर | सुपक्वं कदलीफलं धात्रीफलरसं मधु। शर्करासहितं पेयं सोमधारणमुत्तमम॥ | (ग. नि. ६. १. ६९) | |
| योनिदाह | धात्रीरसं सितायुक्तं योनिदाहे पिबेत सदा॥ | (भ्र. प्र. चि. ७०. ४१) | |
| शिशूनां विच्छिरोग | आमलक्या: पलान्यष्टी गोमूत्रे सप्त भावयेत्॥ भावयित्वातपे पश्र्चाद विच्छिर्लिप्त: प्रशाम्यति॥ | (बं से. बालरोग. ९२२) | |
| शीतपित्त | पिप्पलीवर्धमानं वा लशुनं वा प्रयोजयेत्॥ सितां मधुसंयुक्तां गुडमामलकै: सह॥ | (वृ. मा. ५२. ३) | |
| शीतपित्त | निम्बस्य पत्राण सदा घृतेन धात्रीविमिश्राण्यथवोपयुञ्जयात्। विस्फोटकोठक्शतशीतपित्तकण्ड्वस्रपित्तं रकसाञ्च जह्यात॥ | (वृ. मा ५२. ८) |
Classical Verse From Nighantu
| Source | Varga | Verse |
|---|---|---|
| कैयदेवनिघण्टु | ओषधिवर्ग | जातीफलरसा सीधुरसा सीधुफला तथा | वयःस्था चामृतफला तिष्या तिष्यफलाऽमृता ||२३५|| धात्री वृष्या वृष्यफला दिव्या राधामृतोद्भवा | धात्रीफलं शीतफलं निष्कं(तिष्यं) रसफलं मतम् ||२३६|| श्रीफलञ्चामृतफलं कोलकामलकं शिवम् | शृङ्गी धात्री चामलकी शुक्तिः शुष्कामलक्यपि ||२३७|| तद्वद् धात्री स्वेदमेदोहराम्ला शुक्रला हिमा | भग्न सन्धानकृत् केश्या पिपासाकफपित्तहृत् ||२३८|| तन्मज्जा तुवरः स्वादुस्तृट्छर्द्यनिलपित्तहा | हन्ति वातं तदम्लत्वात् पित्तं माधुर्यशैत्यतः ||२३९|| कफं रूक्षकषायत्वात् फलेभ्योऽभ्यधिकं मतम् | चक्षुष्यं सर्वदोषघ्नं वृष्यमामलकीफलम् ||२४०|| |
| धन्वन्तरिनिघण्टु | गुडूच्यादिवर्ग | वयस्थाऽऽमलकं वृष्यं जातीफलरसं शिवम् | धात्रीफलं श्रीफलं च तथाऽमृतफलं स्मृतम् ||२४३|| कषायं कटुतिक्तोष्णं स्वादु चाऽऽमलकं हिमम् | सरं त्रिदोषहृद्वृष्यं ज्वरघ्नं च रसायनम् ||२४४|| हन्ति वातं तदम्लत्वात्पित्तं माधुर्यशैत्यतः | कफं रूक्षकषायत्वात्फलं धात्र्यास्त्रिदोषजित् ||२४५|| |
| भावप्रकाशनिघण्टु | हरीतक्यादिवर्ग | त्रिष्वामलकमाख्यातं धात्री तिष्यफलाऽमृता | हरीतकीसमं धात्रीफलं किन्तु विशेषतः | रक्तपित्तप्रमेहघ्नं परं वृष्यं रसायनम् ||३६|| हन्ति वातं तदम्लत्वात्पित्तं माधुर्यशैत्यतः | कफं रूक्षकषायत्वात्फलं धात्र्यास्त्रिदोषजित् ||३७|| यस्य यस्य फलस्येह वीर्यं भवति यादृशम् | तस्य तस्यैव वीर्येण मज्जानमपि निर्दिशेत् ||३८|| |
| मदनपालनिघण्टु | अभयादिवर्ग | धात्रीफलाऽमृतफलाऽऽमलकं श्रीफलं शिवम् | तद्वद्धात्रीफलं वृष्यं विशेषाद्रक्तपित्तजित् ||२६|| अम्लत्वात्पवनं हन्ति पित्तं माधुर्यशैत्यतः | कफं रूक्षकषायत्वात्तस्मात्किमधिकं फलम् ||२७|| |
| राजनिघण्टु | आम्रादिवर्ग | आमलकी वयस्था च श्रीफला धात्रिका तथा | अमृता च शिवा शान्ता शीताऽमृतफला तथा ||१५६|| जातीफला च धात्रेयी ज्ञेया धात्रीफला तथा | वृष्या वृत्तफला चैव रोचनी च चतुर्दश ||१५७|| आमलकं कषायाम्लं मधुरं शिशिरं लघु | दाहपित्तवमीमेहशोफघ्नं च रसायनम् ||१५८|| कटु मधुरकषायं किञ्चिदम्लं कफघ्नं रुचिकरमतिशीतं हन्ति पित्तास्रतापम् | श्रमवमनविबन्धाध्मानविष्टम्भदोषप्रशमनममृताभं चामलक्याः फलं स्यात् ||१५९|| |
| सोढलनिघण्टु | गुडूच्यादिवर्ग | धात्रीफले श्रीफलं च तथामृतफलं शिवम् ||२३३|| वयःस्थामलकं वृष्यं जातीफलरसं तथा | अमृतामण्डकं शीतफलं वर्षफलं स्मृतम् ||२३४|| |