Vernacular Names
Bengali
Akarkanta
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🌱 Plant Information
Etymology
| Sanskrit Synonym | Sanskrit (Diacritical) | Reference | Etymology (Sanskrit) | English Meaning |
|---|---|---|---|---|
| अङ्कोटः | Aṅkoṭaḥ | अङ्के गात्रे कोटः कैटिल्यमस्य । अङ्क्यते लष्यते कीलकैरिति वल्लभगणिः निघण्टुशेषे । | ||
| अङ्कोलः(ल्लः) | Aṅkolaḥ(llaḥ) | अङ्क्यते लक्ष्यते कीलकैरिति । | ||
| कोटरी | Koṭarī | गात्रे कोटरवान् । | ||
| गन्धपुष्पः | Gandhapuṣpaḥ | सुगन्धीनि पुष्पाण्यस्य । | ||
| गुप्तस्नेहः | Guptasnehaḥ | बीजे स्नेहस्य रक्षितत्वात् । | ||
| गूढमल्लिका | Gūḍhamallikā | मल्लिकावत्पुष्पत्वात् । कैयदेवः ‘रूढमल्लिका’ इति तथापि स एवार्थः । | ||
| ताम्रफलः | Tāmraphalaḥ | ताम्रवर्णानि फलान्यस्य । | ||
| दीर्घकीलः | Dīrghakīlaḥ | दीर्घाणि कीलानि कीलवत् कण्टकान्यस्य । | ||
| निकोचकः | Nikocakaḥ | गात्रे कौटिल्यात् ‘कुञ्च कौटिल्याल्पीभावयोः’ । | ||
| पीतसारः | pītasāraḥ | पीतवर्गः सारोऽस्य । | ||
| मदनः | Madanaḥ | मदनवत् कण्टकित्वात् । | ||
| रेची | Recī | रेचकत्वात् । | ||
| लम्बकर्णः | Lambakarṇaḥ | लम्बकर्णवत् पत्राण्यस्य । |
Classifications
Properties
Classical Verses Related to Therapeutic Indications
| Vyadhi / Diseases | Context / Formulation | Shloka / Verse | Reference |
|---|---|---|---|
| विष | अथवाऽड्कोटमूलानि त्वच: सप्तच्छदस्य वा। शिरीषमाषका वापि सक्षौद्रा: प्रतिसारणम्॥ | (सु. क. १. ५०.) | |
| विष | एकैकं कारयेत् पुष्पं बन्धूकाड्कोठयोरपि॥ | (सु. क. १. ७२) | |
| विष | अड्कोलमूलकल्को वा बस्तमूत्रेण कल्कित:। पानालेपनयोर्युक्त: सर्वाखुविषनाशन: ॥ | (अ. ह्र. उ. ३८. २८) | |
| विष | कृष्णाड्लोलक्वाथस्तच्चूर्ण वा दिनत्रयं पीतम्॥ पुंसां निहन्ति नूनं दारुणमपि कृत्रिमं गरलम्॥ | (रा. मा. २९. १३) | |
| विष | अड्कोलवृक्षदलधूपविधानयोगान्नाशं प्रयाति विषमाशु नरस्य मात्स्यम्। धूप: पुन: कटुकतैलनृकेशसक्तुक्लृप्तोऽस्य दंशपदके सुतरां प्रशस्त:। | (ग. नि. ७. ९.२) | |
| विष | अड्कोलमूलकल्कश्र्च सक्षौद्रस्तण्डुलाम्बुना। अतीसारहर: प्रोक्तस्तथा विषहर: स्मृत:॥ | (शा. सं. २.५. २३) | |
| विष | अड्कोटवंशजा चापि श्वविषध्नी प्रयत्नत: । | (भा. प्र. चि. ६७. ८८) | |
| विष | अड्कोठमूलनि: क्वाथं फाणितं सघृतं लिहेत्। तैलाक्त: स्विन्नसर्वाडो गरदोषविषापह:॥ | (च. द. ६५. १८) | |
| श्वास | तलकोटस्य बीजेषु पचेदुत्कारिका शुभाम्। सेव्यमाना निहन्त्येषा श्वासानाशु सुदुस्तरान्॥ | (सु. उ. ५१. ४५) | |
| अतिसार | अड्कोठमूलं तक्रेण ह्यतिसारहरं परम्॥ माहिषेण तु तक्रेण पाठापत्रन्तथैव च॥ | (ब. से. अतिसार. १७१) | |
| अतिसार | तण्डुलजलपिष्टाड्कोटमूलकर्षार्धपानमपहरति। सर्वातिसारग्रहणीरोगसमूहं महाघोरम॥ | (च. द. ३. ५४) | |
| अतिसार | अड्कोलमूलकल्ककस्तण्डुलपयसा समाक्षिक: पीत:। सेतुरिव वारिवेगं झटिति निरुन्ध्यादतीसारम॥ | (भा. प्र. चि. २. ३५) | |
| अतिसार | अड्कोठवटक | पलमड्कोठमूलस्य पाठां दार्वाञ्च तत्समाम्। पिष्ट्वा तण्डुलतोयेन वटकानक्षसम्मितान्॥ छायाशुष्कांश्र्च तान कुर्यात्तेष्वेकं तण्डुलाम्बुना पेषयित्वा प्रदगातं पानाय गदिने भिषक्। वातपित्तकफोदभूतान् द्वन्द्वजान सान्निपातिकान्॥ हन्यात् सर्वानतीसारान् वटकोऽयं पयोजित:॥ | (भा. प्र. चि. २. ९६. – ९८; च. द. ३. ५८- ६०) |
| ग्रहणीरोग | अड्कोठस्य त्रयो भागा: भागश्र्चैकोऽरुणाभव:। तण्डुलोदकसंपत्ति: सर्वकुक्ष्यामयापह:। | (बं. से. ग्रहणी. १६७) | |
| कामला | अड्कोलमूलमथवाऽर्कजटा प्रपिष्टा स्वच्छेन तण्डुलजलेन समं प्रयत्नात्॥ स्यात काम्लामयहरी कृतनावनानामघ्रातमात्रमपि जालिनिकाफलं वा॥ | (रा. मा. ३. १८) | |
| रसायन | इष्टार्थसिद्दिगुटिकायाम् | (र. यो. सा., भाग१, पृ १५१) | |
| वाजीकरणे | अड्कोलबदवटी | (र. यो. सा. भाग १. पृ ४६) |