Vernacular Names
Am, Am
Aambaro, Ambanoo, Aambo, Keri
Aam
Amavina
Aamba
Amkoili, Ambakoiti
Amb
Mangottai Paruppu, Maangottai
Mamidi-Jeedi
Aam
Relational Concept Map
Click a category such as Gana to open its related data. Click it again to collapse the data.
🌱 Plant Information
Etymology
| Sanskrit Synonym | Sanskrit (Diacritical) | Reference | Etymology (Sanskrit) | English Meaning |
|---|---|---|---|---|
| आम्रः | Āmraḥ | अम्यते इष्यते आम्रः, ‘अम गलादौ’; अथवा- | ||
| अतिसौरभः | Atisaurabhaḥ | अतिशयसुगन्धि पुष्पमस्य । | ||
| अम्लफलः | Amlaphalaḥ | आमावस्थायामम्लं फलमस्य, यथोक्तं प्रियनिघण्टौ- | ||
| चूतः | Cūtaḥ | च्योतति रसम्, ‘च्युतिट् क्षरणे; ‘च्यवन्ते पक्वानि फलाधिराजः इति च । | ||
| चैत्रवृक्षः | Caitravṛkṣaḥ | चैत्रमासे पुष्पितो वृक्षः । | ||
| पिण्डीफलः | Piṇḍīphalaḥ | पिण्डाकारं फलमस्य । | ||
| मदिरासखः | Madirāsakhaḥ | मदजनक्त्वात् । | ||
| मधुः | Madhuḥ | मधुमासे पुष्पितत्वात् । ‘मधुदूतः’ इति भाव प्रकाशे । | ||
| मधुफलः | madhuphalaḥ | मधूनि मधुराणि फलानि पक्वान्यस्य । | ||
| मन्मथः | Manmathaḥ | कामोद्दीपनत्वात् । | ||
| माकन्दः | Mākandaḥ | मा न कन्दते वैक्लव्यं भजतेऽस्मात् ’कदुङ्वैक्लव्ये’ । | ||
| रसालः | Rasālaḥ | रसेनालति शोभते ‘अल भूशणादौ’ । | ||
| वसन्तपादपः | Vasantapādapaḥ | वसन्ते पुष्पितो वृक्षः । | ||
| शौण्डिकप्रियः | Śauṇḍikapriyaḥ | मदकरत्वाच्छौपिण्डकानां प्रियः । | ||
| श्यामतैलकः | Śyāmatailakaḥ | श्यामवर्ण तैलमस्य । | ||
| सहकारः | Sahakāraḥ | सुगन्धिफलत्वात् । ‘सह कारयति स्त्रीपुंसौ सहकारः’ इति वल्लभगणिः । |
Classifications
| Name | उपयोगी हिस्सा(हिन्दी) | Part Used(Diacritical) | Title (Ref. Book) | Reference Remarks |
|---|---|---|---|---|
| Endosperm | बीजमज्जा | Bījamajjā | ||
| Flower/ inflorescence | पुष्प | Puṣpa | ||
| Fruit | फल | Phala | ||
| Leaf | पत्र | Patra |
| Name | महाकषाय (हिन्दी) | Mahakashaya(Diacritical) | Title (Ref. Book) | Reference Remarks |
|---|---|---|---|---|
| Chardinigrahana Mahakashaya | छर्दिनिग्रहण महाकषाय | Chardinigrahaṇa mahākaṣāya | ||
| Hridya Mahakashaya | हृद्य महाकषाय | Hṛdya mahākaṣāya | ||
| Mutrasangrahaniya Mahakashaya | मूत्रसङ्ग्रहणीय महाकषाय | Mūtrasaṅgrahaṇīya mahākaṣāya | ||
| Purishasangrahaniya Mahakashaya | पुरीषसङ्ग्रहणीय महाकषाय | Purīṣasaṅgrahaṇīya mahākaṣāya |
| Name | वर्ग(हिन्दी) | Varga(Diacritical) | Title (Ref. Book) | Reference Remarks |
|---|---|---|---|---|
| Amradiphalavarga | आम्रादिफलवर्ग | Āmrādiphalavarga | ||
| Amradivarga | आम्रादिवर्ग | Āmrādivarga | ||
| Amradivarga | आम्रादिवर्ग | Āmrādivarga | ||
| Oshadhivarga | ओषधिवर्ग | Oṣadhivarga |
| Name | स्कंध(हिन्दी) | skandha(Diacritical) | Title (Ref. Book) | Reference Remarks |
|---|---|---|---|---|
| Amlaskandha | अम्लस्कन्ध | Amlaskandha | ||
| Kashayaskandha | कषायस्कन्ध | Kaṣāyaskandha |
Properties
| Name | रस (हिन्दी) | Rasa (Diacritical) | Title (Ref. Book) | Author (Ref. Book) | Publisher (Ref. Book) | Reference Remarks |
|---|---|---|---|---|---|---|
| Kashaya/Tuvara | कषाय/तुवर | Kaṣāya/Tuvara | ||||
| Madhura/Svadu | मधुर/स्वादु | Madhura/Svādu |
| Name | गुण(हिन्दी) | Guna(Diacritical) | Title (Ref. Book) | Reference Remarks |
|---|---|---|---|---|
| Laghu/ Aguru | लघु | Laghu | ||
| Ruksha | रुक्ष | Rukṣa |
| Name | विर्य (हिन्दी) | Virya (Diacritical) | Title (Ref. Book) | Reference Remarks |
|---|---|---|---|---|
| Shita Virya | शीत वीर्य | Śīta vīrya |
| Name | विपाक (हिन्दी) | Vipaka(Diacritical) | Title (Ref. Book) | Reference Remarks |
|---|---|---|---|---|
| Katu vipaka | Kaṭu vipāka | कटु विपाक |
| Name | कर्म (हिन्दी) | Karma (Diacritical) | Title (Ref. Book) | Reference Remarks |
|---|---|---|---|---|
| Vranaropana | व्रणरोपण | vraṇaropaṇa | ||
| Anulomana | अनुलोमन | anulomana | ||
| Hridya/ Hridayam (Saumanasyakara) | हृद्य/ हृदयं (सौमनस्यकर) | hṛdya/ hṛdayaṃ (saumanasyakara) | ||
| Dipana | दीपन | dīpana | ||
| Sangrahika/ Sangrahi | संग्राहिक/ संग्राही | saṃgrāhika/ saṃgrāhī | ||
| Vatakara/ Vatakrita/ Vatala/ Vatavardhaka | वातकर/ वातकृत/ वातल/ वातवर्धक | vātakara/ vātakṛta/ vātala/ vātavardhaka | ||
| Krrimighna/ Krimihara/ Jamtughna/ Jantuhara/ Jamtunashaka/ Jantunashana/ Jivanu Nashaka | कृमिघ्न/ क्रिमिहर/ जंतुघ्न/ जन्तुहर/ जंतुनाशक/ जन्तुनाशन/ जीवाणु नाशक | kṛmighna/ krimihara/ jaṃtughna/ jantuhara/ jaṃtunā |
| Name | दोषकर्म (हिन्दी) | Doshakarma (Diacritical) | Title (Ref. Book) | Reference Remarks |
|---|---|---|---|---|
| Vatapittahara/Vatapittashamana/ Vatapittashamana | वातपित्तहर/वातपित्तशमन/ वातपित्तशमन | Vātapittahara/Vātapittaśamana/ Vātapittaśamana |
Usage
| Name | Dosage(Form) | Dosage(Reference) | Title (Ref. Book) | Reference Remarks |
|---|---|---|---|---|
| Nyagrodhadi Kvatha Churna | Kvatha Churna/Kashaya Churna | Ayurvedic Formulary of India (AFI), Part I, 4:16 | ||
| Nyagrodhadi Churna | Churna | Ayurvedic Formulary of India (AFI), Part I, 7:21 | ||
| Mutrasangrahaniya Kashaya Churna | Kvatha Churna/Kashaya Churna | Ayurvedic Formulary of India (AFI), Part II, 4:19 |
| Name | Title (Ref. Book) | Reference Remarks |
|---|---|---|
| Agnimāndya | ||
| aruciḥ | ||
| atisāraḥ | ||
| kosthagata | ||
| krimiroga | ||
| pravāhikā | ||
| vibandha | ||
| raktapittam | ||
| asṛgdaraḥ/raktapradaraḥ | ||
| somarogaḥ/śvetapradaraḥ | ||
| daurbalyam |
Dose
| Name | Title (Ref. Book) | Reference Remarks |
|---|---|---|
| Kvath/ Decoction-50-100ml | ||
| Powder/ Curna- 3-6gm | ||
| Svarasa/ Juice-10-20ml |
Classical Verses Related to Therapeutic Indications
| Vyadhi / Diseases | Context / Formulation | Shloka / Verse | Reference |
|---|---|---|---|
| अतिसार | जम्बाम्रमध्यं बिल्वञ्च सकपित्थं सनागरम्॥ पेयामण्डेन पातव्यमतीसारनिवृत्तये॥ | (च. चि. ८/ १२७) | |
| अतिसार | बिल्वचूतास्थिनिर्यूह: पीत: सक्षौद्रशर्कर:। निहन्याच्छर्घतीसारं वैश्वानर इवहुतिम॥ | (वृ. मा३. ३०) | |
| अतिसार | नवचूतस्य पर्णानि कपित्थफलमेव च। पिष्ट्वा तण्डुलतोयेन पक्वातीसारशान्तये॥ | (बं. से. अतीसार ६१) | |
| अतिसार | शल्लकीबदरीजम्बूप्रियालाम्रार्जुनत्वच:॥ पीता: क्षीरेण मध्वाढया: पृथक शोणितवारणा:॥ | (वृ. मा. ३. ४१) | |
| अतिसार | आम्रस्थिमध्यमालुरफलक्काथ: समाक्षिक:। शर्करासहितो हन्याच्छर्घतीसारमुल्वणम्॥ | (भा. प्र. चि. २. २०७) | |
| अतिसार | रसो निहन्त्यतीसारमाम्रत्वक्पुटपाकज:। तैलेन युक्तो रक्ताढयं सबलासं सनि:स्रवम्॥ | (वै. म. ६. ७) | |
| रक्तपित्त | आम्रं जम्बूं च ककुंभं चूर्णीकृत्य जले क्षिपेत्॥ हिमं तस्य पिबेत् प्रात: सक्षौद्रं रक्तपित्तजित॥ | (शा. सं. २.४.२; सु. उ. ४५, २३) | |
| छर्दि | जम्ब्वाम्रयो: पल्लवजं कषायं पिबेत् सुशीतं मधुसंयुतं बा॥ | (च. चि. २०. ३०) | |
| छर्दि | आम्रस्थिलाजसिन्धूत्थैर्लेह: क्षौद्रेण छर्दिनुत् | (वृ. मा. ६६. ११) | |
| छर्दि | बीजपूराम्रजम्बूनां पल्लवानि जटा: पॄथक। विपचेत् पुटपाकेन क्षौद्रयुक्तश्र्च तद्रस:॥ छर्दि निवारयेद् घोरां सर्वदोषसमुद्भवाम्॥ | (शा. सं. २. १. ३२-३३) | |
| तृष्णा | आम्रजम्बूकषायं वा पिबेन माक्षिकसंयुतम्॥ छर्दि सर्वा प्रणुदति तृष्णां चैवापकर्षति॥ | (वृ. मा. १६. १०) | |
| अंशुघात | आम्रशलाटुभटित्रं जलैर्द्रवीकृत्य जीरपटुमरिचै:। प्रतिसार्य मात्रया पुनरातपदग्ध: सुखाय पिबेत्॥ | (सि. भे. ४. ३८) | |
| प्लीहावृद्धि | प्लीहव्युपरमयोग: पक्वाम्ररसोऽथवा समधु:॥ | (वृ. मा. ३७. ५०) | |
| सुपक्वसहकारस्य रस: क्षौद्रसमन्वित:। पीत: प्रशमयत्येव प्लीहानं नेह संशय:॥ | (भा. प्र. चि. ३३. १७) | ||
| पूयमेह | माकन्दचर्मकल्कं पयसा संगाल्य शर्करामधुरम्। सीर्जाकजन्यशुक्रक्षरणक्षपणाय पिब पक्षम्॥ | (सि. भे ४. ८१०) | |
| त्वकरोग | सलिले चाम्रपेशी तु किञ्चित सिन्धुसमन्विता। ताम्रपात्रे विनिर्घृष्टा लेपश्र्चर्मदलापह:॥ | (बं. से. कुष्ठ. ११३) | |
| आम्रबीजस्य चूर्ण तु शिवाचूर्णसमं द्वयम्॥ दुग्धपिष्ट: प्रलेपोऽयं दारुणं हन्ति दारुणम्॥ | (शा. सं. ३. ११. २०) | ||
| योनिगाढीकरण | माकन्दफलसंयुक्तमधुकर्पूरलेपनात्। गतेऽपि यौवने स्त्रीणां योनिर्गाढाति जायते। | (शा. सं. ३. ११. १११) | |
| मुखपाक | मुखपाके तु बालानामामरसारमयोरज:। गैरिकं क्षौद्रसंयुक्तं भेषजं सरसाञ्जनम्॥ | (बं. से. बालरोग १०८) | |
| अजीर्ण | मत्स्यभक्षजे- आममाम्रफलं मत्स्ये, मांसभक्षणजे- तद्बीजं पिशिते हितम्॥ | (भा. प्रचि. ६. १३९) | |
| शोथ | पुनर्नवापत्ररसालमूलं संक्षुघ तोयार्मणशेषसिद्दम्। चतुर्थभागेन घृतं विपक्वं प्रस्थन्तु तत्कल्कपलाष्टकेन॥ संसेवितं वातबलासरोगान् सर्वाश्र्च शोथानपि दुस्तरांश्र्च। गुल्मोदरप्लीहगुदोद्भवांश्र्च निहन्ति वह्रि कुरुते हि पुसांम॥ | (बं. से. शोथ. ९३-१४) | |
| अरुची | आम्रपानक्रम् | ||
| ज्वर | आम्रजम्बूकिसलयै: वटशुंगप्ररोहकै:॥। उशीरेण कृत: फाण्ट: सक्षौद्रो ज्वरनाशन:॥ | (शा. सं. २. ३. ६) |
Classical Verse From Nighantu
| Source | Varga | Verse |
|---|---|---|
| कैयदेवनिघण्टु | ओषधिवर्ग | अम्रश्चूतश्चैत्रवृक्षो वनपुष्पोत्सवः स्मृतः | सहकारो मन्मथः स्यात् कामाङ्गः श्यामतैलकः ||३३४|| शिलीष्टः सुपथामदो शिष्टः पिकमहोत्सवः | मनोरथो मद्यसहो माकन्दः शौण्डिकप्रियः ||३३५|| पिण्डीफलो रसालः स्यात् परपुष्टोऽतिसौरभः | कान्तः कोकिलबन्धुश्च स्यात् समन्वितकार्यपि ||३३६|| रसालस्तुवरो रूक्षो रक्तपित्तकफव्रणान् | योनिदोषमतीसारं प्रमेहं सन्नियच्छति ||३३७|| कफपित्तप्रशमनं रुच्यमाम्रस्य पल्लवम् | आम्रपुष्पमतीसारं प्रमेहं दुष्टशोणितम् ||३३८|| कफपित्तहरं शीतं रुचिकृद् ग्राहि वातलम् | बालं तस्य फलं रूक्षं कषायकटुकाम्लकम् ||३३९|| वातपित्तास्रकृद् यत्तु बद्धास्थि कफपित्तकृत् | पक्वं तु मधुरं साम्लं गुरु स्निग्धमपित्तलम् ||३४०|| वातघ्नं बृंहणं रुच्यं हृद्यं मांसबलप्रदम् | कषायानुरसं व्रण्यं कफशुक्रविवर्धनम् ||३४१|| शुष्कं कषायमुष्णं च भेदनं कफजित् | सहकाररसोहृद्यः सुरभिः स्निग्धरोचनः ||३४२|| त्वच्यः प्रलेपनेऽभ्यङ्गे केश्यो रौक्ष्यमलापहः | रूक्षश्चूतस्य सङ्ग्राही कृमिवातप्रकोपणः ||३४३|| कषायमधुरो मज्जा, ग्राहिणी त्वक् च दाहनुत् | सहकारभवं तैलं कषायं स्वादुतिक्तकम् ||३४४|| मुखरोगहरं रूक्षं सुगन्धि श्लेष्मवातजित् |३४५| |
| धन्वन्तरिनिघण्टु | आम्रादिवर्ग | आम्रश्चूतो रसालश्च कीरेष्टो मदिरासखः | कामाङ्गः सहकारश्च परपुष्टो मदोद्भवः ||१|| आम्रो रसालो माकन्दः कामाङ्गः पिकबान्धवः | वनपुष्पोत्सवश्चूतः परपुष्टो मदोद्भवः ||२|| मधुश्चूतो मधुफलः सुफलो मदिरासखः | वसन्तपादपोऽसौ तु सहकारोऽतिसौरभः ||३|| बालं कषायं कट्वम्लं रूक्षं वातास्रपित्तकृत् | सम्पूर्णमाम्रमम्लं च रक्तपित्तकफप्रदम् ||४|| हृद्यं वर्णकरं रुच्यं रक्तमांसबलप्रदम् | कषायानुरसं स्वादु वातघ्नं बृंहणं गुरु ||५|| पित्तावरोधि सम्पक्वमाम्रं शुक्रविवर्धनम् | मधुरं बृंहण बल्यं गुरु विष्टम्भ्यजीर्णकृत् ||६|| सहकाररसो हृद्यः सुरभिः स्निग्धरोचनः | त्वङ्मूलपल्लवं ग्राहि कषायं कफपित्तजित् ||७|| पक्वाम्रं सकषायाम्लं भेदनं कफवातजित् | हृद्यं वर्णकरं रुच्यं रक्तमांसबलप्रदम् ||८|| |
| भावप्रकाशनिघण्टु | आम्रादिफलवर्ग | आम्रः प्रोक्तो रसालश्च सहकारोऽतिसौरभः | कामाङ्गो मधुदूतश्च माकन्दः पिकवल्लभः ||१|| |
| मदनपालनिघण्टु | फलादिवर्ग | आम्रश्चूतो रसालोऽसौ सहकारोऽतिसौरभः | माकन्दः पिकबन्धुः स्याद्रसालः कामवल्लभः ||६|| आम्रो ग्राही प्रमेहास्रकफपित्तव्रणाञ्जयेत् | तत्फलं बालमत्यम्लं रूक्षं दोषत्रयास्रजित् ||७|| पक्वं तु मधुरं वृष्यं स्निग्धं हृद्यं बलप्रदम् | गुरु वातहरं रुच्यं वर्ण्यं शीतमपित्तलम् | रसस्तस्य सरः स्निग्धो रोचनो बलवर्णकृत् ||८|| सहकारं च वातघ्नं पित्तश्लेष्मविनाशनम् | कषायं मधुरं वृष्यं गुरु स्निग्धं विशेषतः ||९|| पक्वाम्रं जनयेन्दायुर्मांसशुक्रबलप्रदम् | शुष्काम्रं तु कषायाम्लं भेदनं कफवातजित् ||१०|| |
| राजनिघण्टु | आम्रादिवर्ग | आम्रः कामशरश्चूतो रसालः कामवल्लभः | कामाङ्गः सहकारश्च कीरेष्टो माधवद्रुमः ||९|| भृङ्गाभीष्टः सीधुरसो मधूली कोकिलोत्सवः | वसन्तदूतोऽम्लफलो मदाढ्यो मन्मथालयः ||१०|| मध्वावासः सुमदनः पिकरागो नृपप्रियः | प्रियाम्बुः कोकिलावासः स प्रोक्तस्त्रिकराह्वयः ||११|| आम्रः कषायाम्लरसः सुगन्धिः कण्ठामयघ्नोऽग्निकरश्च बालः | पित्तप्रकोपानिलरक्तदोषप्रदः पटुत्वादि रुचिप्रदश्च ||१२|| बालं पित्तानिलकफकरं तच्च बद्धास्थि तादृक्पक्वं दोषत्रितयशमनं स्वादु पुष्टिं गुरुञ्च | दत्ते धातुप्रचयमधिकं तर्पणं कान्तिकारि ख्यातं तृष्णाश्रमशमकृतौ चूतजातं फलं स्यात् ||१३|| |
| सोढलनिघण्टु | आम्रादिवर्ग | आम्रश्चूतो रसालश्च कीरेष्टो मदिरासखः | कामाङ्गः सहकारश्च परपुष्टो मदोद्भवः ||५६२|| |