Vernacular Names
Assamese
Talha, Kal
Bengali
Kela
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🌱 Plant Information
Etymology
| Sanskrit Synonym | Sanskrit (Diacritical) | Reference | Etymology (Sanskrit) | English Meaning |
|---|---|---|---|---|
| कदली | Kadalī | कं जलं, तद्युतानि दलान्यस्याः; केन वायुना कल्यते विशीर्यते वा, ‘दल विशरणे’, कन्दते कन्द्यते वा, ‘कदि आह्वाने रोदने च’, रोदनमत्र जलस्रावः प्रियनिघण्टौ यथ-‘के जले दलयत्यस्मात् कदलीति प्रकीर्तिता’ इति । | ||
| अंशुमत्फला | Aṃśumatphalā | अंशवः कोणाः, तद्वन्ति फ्लान्यस्याः । | ||
| काष्टीला | Kāṣṭīlā | ईषदष्ठीलमस्याः; काष्टवत् फलयस्या वा । | ||
| गुच्छफला | Gucchaphalā | गुच्छे फलान्यस्थाः । | ||
| दीर्घपत्रा | Dīrghapatrā | दीर्घाणि पत्राण्यस्याः । | ||
| निःसारा | Niḥsārā | साररहिता; काण्डाभासः केवलं पत्रवृन्तैरेव निर्मितः । | ||
| पलाशिका | Palāśikā | पत्रमयी । | ||
| बृहत्पुष्पा | Bṛhatpuṣpā | बृहदाकाराणि पुष्पाण्यस्याः । | ||
| मृत्युपुष्पा | Mṛtyupuṣpā | मृत्युसूचकानि पुष्माण्यस्याः । | ||
| मोचा | Mocā | मुञ्चति जलम् । | ||
| रम्भा | Rambhā | रमन्तेऽस्याम् आरभन्ते माङ्गलिककार्याणि यया; रम्भा अप्सरोविशेषा, जलबहुलप्रदेश जायमानत्वाद् वा रम्भा । | ||
| वारणबुसा | Vāraṇabusā | वारणैः हस्तिभिर्भक्ष्यमाणत्वात् । | ||
| सकृत्फला | Sakṛtphalā | एकदैव फलति । | ||
| स्वादुफला | Svāduphalā | स्वादूनि फलान्यस्याः । | ||
| हस्तिविषाणिका | Hastiviṣāṇikā | बृहत् शृङ्गवत् फलान्यस्याः । |
Classifications
Properties
Classical Verses Related to Therapeutic Indications
| Vyadhi / Diseases | Context / Formulation | Shloka / Verse | Reference |
|---|---|---|---|
| ग्रहण्याम् | उत्स्वेघ किमपि कदलीफलानि सन्नीय कल्पिता पोली। सन्तानिकाविरहिणा दघ्ना सह सेविता जयेद ग्रहणीम॥ | (सि. भे. ४. १७९) | |
| श्र्वास | रम्भाकुन्दशिरीषाणां कुसुमं पिप्पलीयुतम्। पिष्ट्व तण्डुलतोयेन पीत्वा श्वासपोहति॥ | (भा. प्र. चि. १४. ३७) | |
| श्र्वास | श्वासायासविनाशार्थमाशयेत् कदलीफलम्॥ श्रॄतं मूत्रेऽथवा भृष्टमथवाऽड्गरपाचितम्। | (वै. म. ३. १७) | |
| प्रदर | योषिद्रजस्य नितरा समभिप्रवृतौ सर्पिर्युतानि यदि वा कदलीफलानि। | (रा. मा. ३१. ३; ग. नि. ६. १. ५०) | |
| सोमरोग | कदलीनां फलं पक्वं धात्रीफलरसं मधु। शर्करासहितं खादेत् सोमधारणमुत्तमम॥ | (बं से. स्त्रीरोग. ८६; ग. नि. ६. १. ६९) | |
| मूत्रकृच्छ्र | पिबेत् त्रुटि क्षौद्रयुतां कदल्या: रसेन कैडर्यसेन वापि॥ | (च. चि. २६ ५५) | |
| उदररोग | विस्राव्य रम्भादलभस्ममध्यात् तोयं ततस्तेन् कृता विलेपी। स्याद भक्षिता सत्युदरामयानां नाशाय नं दिवसत्रयेण॥ | (ग. नि. २. ३२. १३९) | |
| व्रण | परिणतपरिशुद्दं पत्रसंघं कदल्या: प्रहरति परिकोषोद्भूतपूयं व्रणानाम्॥ | (वै. म. १६. १०५) | |
| सिध्मकुष्ठ | क्षारेण वा कदल्या: रजनीमिश्रेण नाशयति॥ | (ग. नि. २. ३६. १२५) | |
| कर्णरोग | कदल्या: स्वरस: श्रेष्ठ: कदुष्ण: कर्णपूरणे॥ | (सु. उ. २१. १७) |