Vernacular Names
Erri
Bherenda
Castor Oil Plant
Erando
Erand, Rendee, Andu
Harlu
Erand, Erandee
Bheranda
Erand
Gandharva-Hasta, Panchāṅgul, Vātāri, Vardhamana, Deerghadanda, Urubuka, Rubuka, Uttanapatraka, Vyadambaka, Shuklairanda, Amanda, Chitra
Amanakku
Amudanu, Amudmuchetu
Erand
Relational Concept Map
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🌱 Plant Information
Etymology
| Sanskrit Synonym | Sanskrit (Diacritical) | Reference | Etymology (Sanskrit) | English Meaning |
|---|---|---|---|---|
| एरण्डः | Eraṇḍaḥ | आ समन्तादीरयति क्षिपति अपसारयति वायुमिति एरम् एरमण्डं बीजमस्य ‘ईर क्षेपे’ । | ||
| आमण्डः | Āmaṇḍaḥ | आ समन्तान्मण्डयति भूषयति पुष्पैरिति । | ||
| उत्तानपत्रकः | Uttānapatrakaḥ | उत्तानं पत्रमस्य । | ||
| गन्धर्वहस्तः | Gandharvahastaḥ | गन्धर्वस्य हस्त इव पत्रमस्य । | ||
| चित्रबीजः | Citrabījaḥ | चित्रितं बीजमस्य । | ||
| दीर्घदण्डः | Dīrghadaṇḍaḥ | दीर्घं दण्डं पत्रवृन्तमस्य । | ||
| पञ्चाङ्गुलः | Pañcāṅgulaḥ | पञ्चाङ्गुलिवद् विभक्तं पत्रमस्य । | ||
| वर्धमानः | Vardhamānaḥ | आशु वर्धते । | ||
| वातारिः | Vātāriḥ | वातविकाराणामरिः शत्रुर्नाशक इत्यर्थः । | ||
| व्यडम्बकः | Vyaḍambakaḥ | विडम्बयति नटमङ्गभङ्गैर्वायुवेगेन संचालितः । | ||
| व्याघ्रपुच्छः | Vyāghrapucchaḥ | व्याघ्रस्य पुच्छ इव पुष्पदण्डोऽस्य । | ||
| शूलशत्रुः | Śūlaśatruḥ | शूलनाशकः । | ||
| स्नेहप्रदः | Snehapradaḥ | स्नेहं तैलं ददातीति । | ||
| हस्तिपर्णकः | Hastiparṇakaḥ | बृहत् पत्रमस्य । |
Classifications
| Name | उपयोगी हिस्सा(हिन्दी) | Part Used(Diacritical) | Title (Ref. Book) | Reference Remarks |
|---|---|---|---|---|
| Leaf | पत्र | Patra | ||
| Root | मूल | Mūla | ||
| Seed | बीज | Bīja |
| Name | गण(हिन्दी) | Gana(Diacritical) | Title (Ref. Book) | Reference Remarks |
|---|---|---|---|---|
| विदारिगन्धादिगण | Vidārigandhādigaṇa | Vidarigandhadigana |
| Name | महाकषाय (हिन्दी) | Mahakashaya(Diacritical) | Title (Ref. Book) | Reference Remarks |
|---|---|---|---|---|
| Angamardaprashamana Mahakashaya | अङ्गमर्दप्रशमन महाकषाय | Aṅgamardapraśamana mahākaṣāya | ||
| Bhedaniya Mahakashaya | भेदनीय महाकषाय | Bhedanīya mahākaṣāya | ||
| Svedopaga Mahakashaya | स्वेदोपग महाकषाय | Svedopaga mahākaṣāya |
| Name | वर्ग(हिन्दी) | Varga(Diacritical) | Title (Ref. Book) | Reference Remarks |
|---|---|---|---|---|
| Abhayadivarga | अभयादिवर्ग | Abhayādivarga | ||
| Guduchyadivarga | गुडूच्यादिवर्ग | Guḍūcyādivarga | ||
| Guduchyadivarga | गुडूच्यादिवर्ग | Guduchyadivarga | ||
| Oshadhivarga | ओषधिवर्ग | Oṣadhivarga |
| Name | स्कंध(हिन्दी) | skandha(Diacritical) | Title (Ref. Book) | Reference Remarks |
|---|---|---|---|---|
| Madhuraskandha | मधुरस्कन्ध | Madhuraskandha |
Properties
| Name | रस (हिन्दी) | Rasa (Diacritical) | Title (Ref. Book) | Author (Ref. Book) | Publisher (Ref. Book) | Reference Remarks |
|---|---|---|---|---|---|---|
| Madhura/Svadu | मधुर/स्वादु | Madhura/Svādu | ||||
| Katu/Ushana | कटु/उषण | Kaṭu/Uṣaṇa | ||||
| Kashaya/Tuvara | कषाय/तुवर | Kaṣāya/Tuvara |
| Name | गुण(हिन्दी) | Guna(Diacritical) | Title (Ref. Book) | Reference Remarks |
|---|---|---|---|---|
| Snigdha | स्निग्ध | Snigdha | ||
| Tikshna | तीक्ष्ण | Tīkṣṇa | ||
| Sukshma | सुक्ष्म | Sukṣma |
| Name | विर्य (हिन्दी) | Virya (Diacritical) | Title (Ref. Book) | Reference Remarks |
|---|---|---|---|---|
| Ushna Virya | उष्ण वीर्य | Uṣṇa vīrya |
| Name | विपाक (हिन्दी) | Vipaka(Diacritical) | Title (Ref. Book) | Reference Remarks |
|---|---|---|---|---|
| Madhura vipaka | Madhura vipāka | मधुर विपाक |
| Name | कर्म (हिन्दी) | Karma (Diacritical) | Title (Ref. Book) | Reference Remarks |
|---|---|---|---|---|
| Amadoshahara/ Amanashana/ Amapachana/ Amadoshanashaka | आमदोषहर/ आमनाशन/ आमपाचन/ आमदोषनाशक | āmadoṣahara/ āmanāśana/ āmapācana/ āmadoṣanāśaka | ||
| Angamardaprashamana | अङ्गमर्दप्रशमन | aṅgamardapraśamana | ||
| Balya | बल्य | balya | ||
| Dipana | दीपन | dīpana | ||
| Garbhashayavishodhana | गर्भाशयविशोधन | garbhāśayaviśodhana | ||
| Hridya/ Hridayam (Saumanasyakara) | हृद्य/ हृदयं (सौमनस्यकर) | hṛdya/ hṛdayaṃ (saumanasyakara) | ||
| Kushthaghna/ Kushthahara | कुष्ठघ्न/ कुष्ठहर | kuṣṭhaghna/ kuṣṭhahara | ||
| Malamutravishodhani | मलमूत्रविशोधनि | malamūtraviśodhani | ||
| Medhya/ Medhakara/ Medhavardhaka | मेध्य/ मेधाकर/ मेधावर्धक | medhya/ medhākara/ medhāvardhaka | ||
| Shothahara/ Shophaghna/ Shothaghna/ Shvayathuhara | शोथहर/ शोफघ्न/शोथघ्न/ श्वयथुहर | śothahara/ śophaghna/śothaghna/ śvayathuhara | ||
| Shukrashodhana | शुक्रशोधन | śukraśodhana | ||
| Stanyajanana/ Stanyada/ Stanyakara | स्तन्यजनन/ स्तन्यद/ स्तन्यकर | stanyajanana/ stanyada/ stanyakara | ||
| Svedala/ Svedjanana | स्वेदल/ स्वेद्जनन | svedala/ svedjanana | ||
| Vedanasthapana | वेदनास्थापन | vedanāsthāpana | ||
| Vishaghna/ Vishanashana | विषघ्न/ विषनाशन | viṣaghna/ viṣanāśana | ||
| Kaphavatahara/ Vatakaphaghna/ Kaphavatahara/ Kaphavatahrrita/ Kaphavatajita/ Kaphavatanuta/ Kaphavat | कफवातहर/ वातकफघ्न/ कफवातहर/ कफवातहृत/ कफवातजित/ कफवातनुत/ कफवातशामक | kaphavātahara/ vātakaphaghna/ kaphavātahara/ kapha | ||
| Vrishya | वृष्य | vṛṣya | ||
| Krrimighna/ Krimihara/ Jamtughna/ Jantuhara/ Jamtunashaka/ Jantunashana/ Jivanu Nashaka | कृमिघ्न/ क्रिमिहर/ जंतुघ्न/ जन्तुहर/ जंतुनाशक/ जन्तुनाशन/ जीवाणु नाशक | kṛmighna/ krimihara/ jaṃtughna/ jantuhara/ jaṃtunā | ||
| Pittakara/ Pittala/ Pittaprakopaka/ Pittavardhaka | पित्तकर/ पित्तल/ पित्तप्रकोपक/ पित्तवर्धक | pittakara/ pittala/ pittaprakopaka/ pittavardhaka | ||
| Raktaprakopaka | रक्तप्रकोपक | raktaprakopaka | ||
| Yakrituttejaka | यकृतुत्तेजक | yakṛtuttejaka |
| Name | दोषकर्म (हिन्दी) | Doshakarma (Diacritical) | Title (Ref. Book) | Reference Remarks |
|---|---|---|---|---|
| KaphaVatahara/KaphaVatashamana/ KaphaVstasaṃshamana | कफवातहर/ कफवातशमन/ कफवातसंशमन | KaphaVātahara/KaphaVātaśamana/ KaphaVātasaṃśamana |
Usage
| Name | Dosage(Form) | Dosage(Reference) | Title (Ref. Book) | Reference Remarks |
|---|---|---|---|---|
| Brahma Rasayana | Avaleha/Leha/Paka | Ayurvedic Formulary of India (AFI), Part I, 3:20 | ||
| Sukumara Ghrita | Ghrita | Ayurvedic Formulary of India (AFI), Part I, 6:44 | ||
| Shadbindu Taila | Taila | Ayurvedic Formulary of India (AFI), Part I, 8:58 | ||
| Triphaladi Taila | Taila | Ayurvedic Formulary of India (AFI), Part I, 8:21 |
| Name | Title (Ref. Book) | Reference Remarks |
|---|---|---|
| āmavātaḥ | ||
| gṛdhrasī | ||
| hṛdayaśūlaḥ | ||
| nadidaurblya | ||
| Sandhisotha | ||
| vātaraktam |
Dose
| Name | Title (Ref. Book) | Reference Remarks |
|---|---|---|
| Seed-2-6 | ||
| Tail- 4-16ml | ||
| Kalka/Paste-10-20gm | ||
| Kalka/Paste-10-20gm | ||
| Tail- 4-16ml | ||
| Seed-2-6 |
Classical Verses Related to Therapeutic Indications
| Vyadhi / Diseases | Context / Formulation | Shloka / Verse | Reference |
|---|---|---|---|
| ज्वर | एरण्डमोलोत्क्वथितं ज्वरात् सपरिकर्तिकात्। पयो विमुच्यते पीत्वा तद्वद बिल्वशलाटुभि:॥ | (च. चि. ३. २३५) | |
| ज्वर | श्रृतमेरण्डमूलेन बालबिल्वेन वा ज्वरात्। धारोष्णं वा पय: पीत्वा विबद्दनिलवर्चस:॥ सरक्तपिच्छातिसृतै: सतृटशूलप्रवाहिकान्॥ | (अ. ह्र्. चि. १. ११२) | |
| ज्वर | एरण्डस्य तु पत्राणि लिप्तभूमौ निधापयेत्॥ दाहादिज्वरिणो देहे तानि पत्राणि धारयेत्। तेन नश्यति दाहोऽस्य ज्वरश्र्चैवोपशाम्यति। दाहे शान्ते यदा शैत्यं तच्च युक्त्या निवारयेत्॥ | (भ. प्र. चि. १. ७८५-८६) | |
| अतिसार | श्रृतमरेण्डमूलेन बालबिल्वेन वा पय:। | (च. चि. २९. ४८) | |
| अतिसार | अथैवरण्डसिद्देन पयसा केवलेन वा। यवागूर्वितरेच्चास्य वातघ्नैर्दीपनै: कृता:॥ | (सु. उ. ४०. १३९) | |
| अतिसार | यमकस्योपरि क्षीरं धारोष्णं वा प्रयोजयेत्॥ श्रृतमेरण्डमूलेन बालबिल्वेन वा पुन:॥ | (अ. ह्र. चि. ९ ३८) | |
| अर्श | वृषार्कैरण्डबिल्वानां पत्रोत्क्वाथैश्र्च सेचयेत्॥ | (च. चि. १४. ४४) | |
| अर्श | एरण्डतैलं त्रिफलारसेन च विशोधनम्॥ विटपित्त श्र्लेष्मवातानुलोमनाद् गुदजापहम्। | (ग. नि. २. ४. १०३) | |
| कास | एरण्डपत्रक्षारं वा व्योषतैलगुडान्वितम्॥ लिह्यादेतेन विधिना सुरसैरण्डपत्रजम्॥ | (च. चि. १८. १७२; अ. ह्र. चि. ३. १६९) | |
| पार्श्वशूल | एरण्डमूलं द्विपल् जलेऽष्टगुणिते पचेत्। तत्क्वाथो यावशूकाढय: पार्श्वह्रतफशूलहा। | (शा. सं. २.२. १०१) | |
| विबन्ध | एरण्डतैलं त्रिफलाक्वाथेन द्विगुणेन च। युक्तं पीतं पयोभिर्वा न चिरेणा विरिच्यते॥ | (शा. सं. ३. ४. २०) | |
| विबन्ध | चाग्य्रमैरण्डं तु विरेचने | (च. सू १३. १२) | |
| गुल्म | पिबेदेण्डजं तैलं वारुणीमण्डमिश्रितम्। तदेव तैलं पयसा वातगुल्मी पिबेन्नर:॥ | (च. चि. ५. ९२; वृ. मा. ३० ९) | |
| गुल्म | एरण्डतैलमथवा मघमस्तुपयोरसै:॥ | (सु. उ. ४२. १२२) | |
| शूल | तैलमेरण्डजं वापि मधुकक्वाथसंयुतम् शूलं पित्तोदभवं हन्याद् गुल्मं पैत्तिकमेव च॥ | (च. द. २६. ३२) | |
| शूल | विश्वमेरण्डजं मूलं क्वाथयित्वा जलं पिबेत्। हिंगुसौवर्चलोपेतं सघ: शूलनिवारणम्॥ | (भा. प्र. चि. ३०. ५७) | |
| शूल | एरण्डमेथिकागुडनिर्यूहो हरति जठरशूलानि | (सि. भे. ४. ५०७) | |
| स्थौल्य | क्षारं वातारिपत्रस्य हिंगुयुक्तं पिबेन्नर:। मेदोवृद्दिविनाशाय भक्तं मण्डसमन्वितम्॥ | (भा. प्र. चि. ३९. २१) | |
| स्थौल्य | यदवोरुबूकमूलं मधुदिग्धं स्थाप्यते निशां सकलाम्। तस्य सलिलस्य पानाज्जठरे वृद्दि: शमं याति॥ | (भा. प्र. चि. ३९. २५) | |
| उदर | सञ्जातबलकायाग्नि पुन: स्निग्धं विरेचयेत्। पयसा सत्रिवृतकल्केनोरुबूकश्रृतेन वा॥ | (च. चि. १३. ६१) | |
| उदर | एरण्डतैलमहरहर्मासं द्वौ वा केवलं मूत्रयुक्त क्षीरयुक्तं वा सेवेतादकवर्जी॥ | (सु. चि. १४. १०) | |
| उदर | पाययैतैलमैरण्डं समूत्रं सपयोऽपि वा॥ | (अ. ह्र. चि. १५ २) | |
| उदर | कफे वातेन पिते वा ताभ्यां वाऽप्यावृतेऽनिले॥ बलिन: स्वौषधयुतं तैलमेरण्डजं हितम्॥ | (अ. ह्र. चि. १५ ४७) | |
| उदर | एरण्डतैलं दशमूलमिश्रं गोमूत्रयुक्तस्त्रिफलारसो वा। निहन्ति वातोदरशोथशूलं क्वाथ: समूत्रो दशमूलजश्र्च॥ | (वृ. मा. ३८. २) | |
| शोथ | विड्वातसडे पयसा रसैर्वा प्राग्भक्तमघादुरुवूकतैलम्॥ | (च. चि. १२. २८) | |
| शोथ | तत्र वातश्वयथौ त्रैवृतमेरण्डतैलं वा मासमर्धमासं पाययेत्॥ | (सु. चि. २३. ११) | |
| शोथ | एरण्डतैलं पयसा गवां मूत्रेण वा पिबेत्॥ तेनास्य दोषशेषश्र्च श्वयथुश्र्च निवर्त्तेते॥ | (का. सं. पृ. ३४२) | |
| श्र्लीपदे | मासमेरण्डजं तैलं प्बेन् मूत्रेण संयुतम्॥ पयसौदनमश्नीयान्नागरक्वथितेन च॥ | (सु. चि. १९. ५३-५४; अ. ह्र. उ. ३० ९) | |
| वृदौ | सक्षीरं वा पिबेत्तैलं मासमेरण्डसंभवम्॥ | (वृ. मा. ४० २) | |
| तैलमेरण्डजं पीत्वा बलासिद्दं पयोन्वितम्॥ आध्मानशूलोपचितामन्त्रवृद्दि जयेन्नर:॥ | (वृ. मा. ४०. १२) | ||
| वातव्याधी | गन्धर्वहस्तमुष्ककनक्तमालाटरुपकपूतीका- रग्वधचित्रकादीनां पत्राण्यार्द्राणि लवणेन सहोदूखलेऽवक्षुघ स्नेहघटे प्रक्षिप्यावलिप्य गोशकृद्दिर्दाहयेत्। एतत पत्रलवणमुशान्ति वातरोगेषु॥ | (सु. चि. ४. ३०) | |
| वातव्याधी | तैलमेरण्डजं वापि गोमूत्रेण पिबेन्नर:। मासमेकं प्रयोगोऽयं गॄधस्यूरुग्रहापह:॥ | (वृ. मा. २२. ६०) | |
| वातव्याधी | अश्नाति यो नर: सिद्दमेरण्डफलमिश्रिताम्। यवागूं गृध्रसीखिन्न: पूर्वामाप्नोत्यसौ गतिम्॥ | (बं. से. वातव्याधि ५८८) | |
| वातव्याधी | विशोध्यैरण्डबीजानि पिष्ट्वा क्षीरे विपाचयेत्। तत पायसं कटीशूले गृध्रस्यां परमौषधम्॥ | (वृ. मा. २२. ५०) | |
| वातव्याधी | दशमूलकषायेण पिबेद् वा नागराभसा। कटिशूलेषु सर्वेषु तैलमेरण्डसंभवम्॥ | (वृ.मा. २२. ६३; भा. प्र. चि. २६. ५५) | |
| वातव्याधी | एरण्डतैलं निर्गुण्डीस्वरसं च पृथक समम्॥ पीत्वा कटेप्रदेशस्थं वातं जित्वा सुखी भवेत्॥ | (वै. म. १२.८) | |
| वातव्याधी | रक्तावसेचनं कुर्यादभीक्ष्णं वातकण्टके। प्बेदेरण्डतैलं वा दहेत् सूचीभिरेव च॥ | (वृ. म २. ६१) | |
| वातव्याधी | एरण्डतैलं वर्च:स्थे | (अ. ह्र चि. २२. ६२) | |
| वातरक्त | क्षीरपिष्टमुमालेपमेरण्डस्य फलानि च। कुर्याच्छूलनिवृत्यर्थ शताह्रमनिलेऽधिके॥ | (च. चि. २९. १४०) | |
| वातरक्त | क्षीरेणैरण्डतैलञ्च प्रयोगेण पिबेन्नर:। बहुदोषो विरेकार्थ जीर्णे क्षीरोदनाशन:॥ | (अ. ह्र. चि. २२. ११) | |
| वातरक्त | एरण्डातैलयुक्तां हरीतकी भक्षयेन्नते विधिवत्। आमानिलार्त्तियुक्तो गृध्रसिवृदध्यर्दितो नित्यम॥ | (वृ. मा. २५. ११) | |
| वातरक्त | आमवातगजेन्द्रस्य शरीरवचचारिण:। एक एव् निहन्त्याशु एरण्डनेहकेसरी। | (भा. प्र. चि. २६. ५०) | |
| वातरक्त | सेचनञ्चामवातस्य रुबूकपयसाऽपि वा॥ | (भा. प्र. चि. २६. २८) | |
| वातरक्त | शुण्ठीकल्कं विनिक्षिप्य रसैरेण्डमूलजै:। विपचेत् पुटपाकेन तद्रस: क्षौद्रसंयुत:॥ आमवातसमुद्भूतां पीडां जयति दुस्तराम्॥ | (शा. सं. २. १. ४०-४१) | |
| व्रण पत्रदानार्थ | एरण्डभूर्जपूतीकहरिद्राणां तु वातजे। पत्रमाश्वबलं यच्च काश्मरीपत्रमेव च॥ | (सु. चि. १. ११३) | |
| वाताभिष्यन्द नेत्ररोग | एरण्डपल्ल्वे मूले त्वचि वाजं पय: श्रॄतम्॥ कण्टकार्याश्र्च मूलेषु सुखोष्णं सेचने हितम्॥ | (सु. उ. ९. ११; वृ. मा. ६१. ७) | |
| वाताभिष्यन्द नेत्ररोग | तरुणमुरुवूकपत्रं मूलञ्च विभिघ सिद्दमाजे क्षीरे॥ वाताभिष्यन्दरुजं सघो विनिहन्ति सक्तुपिण्डिका चोष्णा॥ | (अ. ह्र्. उ. १६. १०) | |
| वाताभिष्यन्द नेत्ररोग | एरण्डदलमूलत्वक्श्रृतमाजं पयो हितम्॥ सुखोष्णां नेत्रयो: सिक्तं वाताभिष्यन्दनाशन्म॥ | (भा. प्र. चि. ६३. १४१) | |
| वाताभिष्यन्द नेत्ररोग | वाताभिष्यन्दशान्त्यर्थ स्निग्धोष्णा पिण्डिका भवेत्॥ एरण्डपत्रमूलत्वक् निर्मिता वातनाशिनी॥ | (शा. सं. ३. १३. २५) | |
| तिमिर | पयोविमिश्रं पवनोद्भवे हितं वदन्ति पंचांगुलतैलमेव तु॥ | (सु. उ. १७ २९) | |
| नक्तान्ध्य | घृत सिद्दानि जीवन्त्या: पल्लवानि चभक्षयेत्॥ तथातिमुक्तकैरण्डशेफाल्यभिरुजानि च। भृष्टं घृतं कुम्भयोने: पत्रै: पाने च पूजितम्॥ | (अ. ह्र. उ. १३. ८८-८९) | |
| वातरक्तजनेत्ररोग | एरण्डमूलं सफलप्ररोहं दिक्षरि क्षीरयुतं गवां च। स्याद वातरक्तापहमुग्रमेतदाश्र्च्योतनं सदभिषजो वदन्ति॥ | (ग. नि. ३. ३ १२६) | |
| कर्णशूल | एरण्डपत्रपुटपाक विपाचिताम्बु तुल्यार्द्रकस्य सलिलं मधुकेन मिश्रम्। पक्त्वा च तैललवणेन युतं सुखोष्णं कर्णे रुजं हरति ततक्षणमेव दत्तम्॥ | (बं. से. कर्णरोग. ३८) | |
| कर्णशूल | एरण्डादितैलम् | (बं. से. कर्णरोग. ५८-५८) | |
| मषक | वातारिपत्रवृन्तप्रान्तेनादाय चूर्णकं बहुश:। निर्घृष्टस्तेन मष: प्रस्रुतरुधिर: क्षयं याति॥ | (ग. नि. ४. १०. ८७) | |
| योनिशूल | योनिशूलहरं नारी योन्यां प्रक्षिप्य धारयेत्॥ पिचुमेरण्डबीजं तु परिगृहय विधानत:॥ | (ग. नि. ६. ६ ८) | |
| एरण्डतैलेन परिप्लता स्यात कार्पासपिण्डी यदि योनिमध्ये। शूलं तदानीं शमयेत्तदीयं संयावको मुण्डीतिकाकृतो वा॥ | (ग. नि. ६.६. १६) | ||
| गर्भजनन | एरण्डस्य तु बीजानि मातुलुंगस्य चैव हि। सर्पिषा परिपिष्टानि पिबेद गर्भप्रदानि च॥ | (ग. नि. ६. ५. ४) | |
| अशमर्यां मूत्राघाते मूत्रकृच्छ्रे च | एर्वारुबीजं त्रपुषात कुसुम्भात् सकुड्कम: स्याद वृषकश्र्च पेय:। द्राक्षारसेनाश्मरिशर्करासु सर्वेषु कृच्छ्रेषु प्रशस्त एष:। एर्वारुबीजं मधुकं सदारु पैत्ते पिबेतण्डुलधावनेन॥ | (च. चि. २६, ५२-५३) | |
| अशमर्यां मूत्राघाते मूत्रकृच्छ्रे च | कल्कमेर्वारुबीजानामक्षमात्रं ससैन्धवम्। धान्याम्लयुक्तं पीत्वैव मूत्रकृच्छ्रात प्रमुच्यते॥ | (सु. उ. ५८, २९; वृ. मा ३३, ५) | |
| अशमर्यां मूत्राघाते मूत्रकृच्छ्रे च | एर्वारुबीजयष्टयाह्र्दार्वीर्वा तण्डुलाम्बुना। तोयेन कल्कं द्राक्षाया: पिबेत् पर्युषितेन वा। | (अ. ह्र. चि. ११ ८) | |
| अशमर्यां मूत्राघाते मूत्रकृच्छ्रे च | एर्वारुबीजकल्कश्र्च श्र्लक्ष्णपिष्टोऽक्षसंमित:। धान्याम्ललवणै: पेयो मूत्रकृच्छ्रविनाशन:॥ | (भा. प्र. चि. ३५. ३७) | |
| मूत्रज उदावर्त्त | एर्वारुबीजं तोयेन पिबेद वाऽलवणीकृतम्। | (सु. उ. ५५. २५) | |
| गर्भिणीशूले | कर्कटीमूलसंसिद्दं क्षीरं शूलहरं परम्॥ | (वै. म. १३. २३) |
Classical Verse From Nighantu
| Source | Varga | Verse |
|---|---|---|
| कैयदेवनिघण्टु | ओषधिवर्ग | एरण्डको यक्षहस्ता रुबुरुत्तानपत्रकः ||११३|| पञ्चाङ्गुलो व्याघ्रपुच्छो वर्धमानस्तु चित्रकः | गन्धर्वस्तरुणः शुक्लोरुबुको दीर्घदण्डकः ||११४|| एरण्डो मधुरो वृष्यो गुरूष्णो मार्गशोधनः | कफपित्तानिलश्वासकासवर्ध्माश्मनाशनः ||११५|| गुल्मप्लीहोदरानाहकटीवस्तिशिरोरुजि | मेहज्वरामवातास्रशूलशोफेषु शस्यते ||११६|| एरण्डपत्रं वातघ्नं कफक्रिमिविनाशनम् | रक्तपित्तप्रकोपि स्यात् मूत्रदोषं जयेदपि ||११७|| गुल्मं च वस्तिशूलं च वृद्धिं सप्तविधां तथा | कफवातकृमींश्चापि हन्यादेरण्डपल्लवम् ||११८|| एरण्डपुष्पं वातघ्नं कफपित्तविनाशनम् | मूत्रदोषहरं ज्ञेयं रक्तपित्तप्रकोपणम् ||११९|| एरण्डफलमत्युष्णं गुल्मशूलानिलापहम् | यकृत्प्लीहोदरार्शोघ्नं कटुकं दीपनं परम् ||१२०|| तद्वन्मज्जा च विड्भेदी वातश्लेष्मोदरापहः |१२१| |
| धन्वन्तरिनिघण्टु | गुडूच्यादिवर्ग | एरण्डः तरुणः शुक्लश्चित्रो गन्धर्वहस्तकः | पञ्चाङ्गुलो वर्धमान आमण्डो दीर्घदण्डकः ||३२७|| रक्तोऽपरो हस्तपर्णो व्याघ्रो व्याघ्रदलो रुबुः | रुबुको हस्तिकर्णी च चञ्चुकोत्तानपत्रकः ||३२८|| एरण्डस्तु रसे तिक्तः स्वादूष्णोऽनिलनाशनः | उदावर्तप्लीहगुल्मबस्तिशूलान्त्रवृद्धिनुत् ||३२९|| गुरुर्वातप्रशमनो विकाराञ्शौणिताञ्जयेत् | फलं स्वादु च सक्षारं लघूष्णं भेदि वातजित् ||३३०|| एरण्डयुगलं वृष्यं स्वदु पित्तसमीरजित् |३३१| |
| भावप्रकाशनिघण्टु | गुडूच्यादिवर्ग | शुक्ल एरण्ड आमण्डश्चित्रो गन्धर्वहस्तकः | पञ्चाङ्गुलो वर्धमानो दीर्घदण्डोऽप्यदण्डकः | वातारिस्तरुणश्चापि रुबूकश्च निगद्यते ||५२|| रक्तैरण्ड- रक्तोऽपरो रुबूकः स्यादुरुबूको रुबुस्तथा | व्याघ्रपुच्छश्च वातारिश्चञ्चुरुत्तानपत्रकः ||५३|| एरण्डयुग्मं मधुरमुष्णं गुरु विनाशयेत् | शूलशोथकटीबस्तिशिरःपीडोदरज्वरान् ||५४|| ब्रध्नश्वासकफानाहकासकुष्ठाममारुतान् | एरण्डपत्रं वातघ्नं कफक्रिमिविनाशनम् ||५५|| मूत्रकृच्छ्रहरं चापि पित्तरक्तप्रकोपणम् | वातार्यग्रदलं गुल्मं बस्तिशूलहरं परम् ||५६|| कफवातकृमीन्हन्ति वृद्धिं सप्तविधामपि | एरण्डफलमत्युष्णं गुल्मशूलानिलापहम् ||५७|| यकृत्प्लीहोदरार्शोघ्नं कटुकं दीपनं परम् | तद्वन्मज्जा च विड्भेदीवातश्लेष्मोदरापहः ||५८|| |
| मदनपालनिघण्टु | अभयादिवर्ग | एरण्डो दीर्घदण्डः स्यात्तरुणो वर्धमानकः | चित्रः पञ्चाङ्गुलो व्याघ्रपुच्छो गन्धर्वहस्तकः ||९३|| रक्तैरण्डो हस्तिकर्णो व्याघ्रो व्याघ्रतरो लघुः | उत्तानपत्र उरुबुर्वातवैरी च चङ्कुला ||९४|| एरण्डयुग्मं मधुरमुष्णं गुरु विनाशयेत् | शूलशोफकटीबस्तिशिरः पीडोदरज्वरान् ||९५|| ब्रध्नश्वासकफानाहकासकुष्टाममारुतान् | तत्फलं भेदनं स्वादु क्षारमुष्णं समीरजित् ||९६|| |
| मदनपालनिघण्टु | पानीयादिवर्ग | एरण्डतैलं मधुरमुष्णं दीपनशोधनम् | वृष्यं त्वच्यं वयः स्थापि मेधाकान्तिबलप्रदम् | कषायानुरसं सूक्ष्मं योनिशुक्रविशोधनम् ||१४१|| हन्ति वातोदरानाहगुल्माष्ठीलाकटिग्रहान् | वातशोणितशूलादिव्रणशोथामविद्रधीन् ||१४२|| |
| राजनिघण्टु | क्षीरादिवर्ग | एरण्डतैलं कृमिदोषनाशनं वातामयघ्नं सकलाङ्गशूलहृत् | कुष्ठापहं स्वादु रसायनोत्तमं पित्तप्रकोपं कुरुतेऽतिदीपनम् ||११४|| |
| सोढलनिघण्टु | गुडूच्यादिवर्ग | एरण्डः शोषशूलघ्नो वृष्यो वातहरः परम् ||२५८|| |
| सोढलनिघण्टु | तैलवर्ग | तैलमेरण्डजं तिक्तं स्वादूष्णं कटुकं सरम् | हृद्बस्तिपार्श्वजानूरुत्रिकपृष्ठाङ्घ्रिशोषिणाम् ||७७१|| आनाहाष्ठीलवातासृक्प्लीहोदावर्तशूलिनाम् | हितमामानिले चाग्र्यं विषमज्वरबन्धजित् ||७७२|| ग्रन्थिवृद्ध्युदरश्लेष्मगुल्मवातहरं गुरु | रक्तैरण्डभवं तद्वद्विस्रं तीक्ष्णोष्णपिच्छिलम् ||७७३|| |