Vernacular Names
Assamese
Kuhiyare
Bengali
Akh
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🌱 Plant Information
Etymology
| Sanskrit Synonym | Sanskrit (Diacritical) | Reference | Etymology (Sanskrit) | English Meaning |
|---|---|---|---|---|
| इक्षुः | Ikṣuḥ | इष्यते इति । | ||
| असिपत्रः | Asipatraḥ | असिरिव तीक्ष्णधारं पत्रमस्य । | ||
| गण्डकी | Gaṇḍakī | गण्डाः पर्वाणि सन्त्यस्मिन् । | ||
| गुडदारु | Guḍadāru | गुडमूलः दार्विव । | ||
| गुडमूलः | Guḍamūlaḥ | गुडस्य मूलं योनिः। | ||
| तूलः | Tūlaḥ | तूलवत् पुष्पाण्यस्य । | ||
| दीर्घच्छदः | Dīrghacchadaḥ | दीर्घाश्द्ददा अस्य । | ||
| भूरिरसः | Bhūrirasaḥ | प्रचुररसः । | ||
| मधुतृणः | Madhutṛṇaḥ | मधुरस्तृणजातीयः । | ||
| मृत्युपुष्पः | Mṛtyupuṣpaḥ | अन्तसूचकानि पुष्पाण्यस्य । | ||
| रसालः | Rasālaḥ | रसेनलति शोभते । |
Classifications
Properties
Classical Verses Related to Therapeutic Indications
| Vyadhi / Diseases | Context / Formulation | Shloka / Verse | Reference |
|---|---|---|---|
| रक्तपित्त | मधूदकस्येक्षुरसस्य चैव पानाच्छमं गच्छति रक्तपित्तम्। | (च्.चि. ४. ७९) | |
| द्राक्षारसस्येक्षुरसस्य नस्यम्॥ | (च. चि. ४. १००) | ||
| शुद्देक्षुकाण्डमापोथ्य नवे कुम्भे हिमाम्भसा। योजयित्वा क्षिपेद् रात्रावाकाशे सोत्पलं तु तत्॥ प्रात: स्रुतं क्षौद्रयुतं पिबेच्छोणितपित्तवान॥ | (सु. उ. ४५ २१-२२) | ||
| आपोथ्य वा नवे कुम्भे प्लावयोदिक्षुगण्डिका:॥ स्थितं तद गुप्तमाकाशे रात्रि प्रात: श्रृतं जलम्॥ मधुमृद्वीकजाम्भोजकृतोत्तंसञ्च तद्गुणम्॥ | (अ, ग्र, चु, २, ३३) | ||
| ग्रहणीरोग | तद्वद द्राक्षेक्षुखर्जूरस्वरसानासुतान् पिबेत् | (च. चि. १५. १५१) | |
| कास | पिबेद घृतं चेक्षुरसे विपक्वम्॥ | ( सु. उ. ५२ ३५) | |
| हिक्का | सर्पि: कोष्णं क्षीरमिक्षो रसो वा नातिक्षीणे छर्दनं शान्तिहेतो:॥ | (सु. उ. ५०. १७) | |
| तृष्णा | नारीपय: सशर्करमुष्ट्रया अपि नस्यमिक्षुरस:॥ | (च. चि. २२. ३३) | |
| तृष्णा | तृष्णोदभवां हन्ति जलम् सुशीतं सशर्करं सेक्षुरसं तथाम्भ:॥ | (सु. उ. ४८. ३२) | |
| मुखवैरस्य | कवलान धारयेदिष्टान् क्षीरस्यक्षुरसस्य च॥ | (च. चि. ८. १३०) | |
| अतिकार्श्य | इक्शव: शालयो आषा गोधूमा गुडवैकृतम्। हत्वातिकार्श्य माधत्ते नृणासुपचयं परम्॥ | (च. सू. २१. ३१-३३) | |
| पाण्डुरोग | धात्रीफलानां रसमिक्षुजञ्च मन्थं पिबेत क्षौद्रयुतं हिताशी॥ | (सु. उ. ४४. १८) | |
| विसर्प | कुर्यात्……………सशर्करैरिक्षुरसैश्र्च सेकान | (सु. चि. १७, ९) |