Vernacular Names
Kantakar, Katvaedana
Kantakari
Bharingani
Katai, Katali, Ringani, Bhatakataiya, Chhotikateri
Nelagulla, Kiragulla
Bhauringani, Kataringani
Chakada Bhoji, Bhejibaugana, Ankarati
Kandiari
Kandangatri, Kandankatri, Kandanghathiri
Nelamulaka, Pinnamulaka, Mulaka, Chinnamulaka, Vakudu
Relational Concept Map
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🌱 Plant Information
Etymology
Classifications
| Name | उपयोगी हिस्सा(हिन्दी) | Part Used(Diacritical) | Title (Ref. Book) | Reference Remarks |
|---|---|---|---|---|
| Whole plant | पञ्चाङ्ग | Pañcāṅga |
| Name | गण(हिन्दी) | Gana(Diacritical) | Title (Ref. Book) | Reference Remarks |
|---|---|---|---|---|
| बृहत्यादिगण | Bṛhatyādigaṇa | Brihatyadigana | ||
| लघुपञ्चमूल | Laghupañcamūla | Laghupanchamula | ||
| वरुणादिगण | Varuṇādigaṇa | Varunadigana |
| Name | महाकषाय (हिन्दी) | Mahakashaya(Diacritical) | Title (Ref. Book) | Reference Remarks |
|---|---|---|---|---|
| Angamardaprashamana Mahakashaya | अङ्गमर्दप्रशमन महाकषाय | Aṅgamardapraśamana mahākaṣāya | ||
| Hikkanigrahana Mahakashaya | हिक्कानिग्रहण महाकषाय | Hikkānigrahaṇa mahākaṣāya | ||
| Kanthya Mahakashaya | कण्ठ्य महाकषाय | Kaṇṭhya mahākaṣāya | ||
| Kasahara Mahakashaya | कासहर महाकषाय | Kāsahara mahākaṣāya | ||
| Shitaprashamana Mahakashaya | शीतप्रशमन महाकषाय | Śītapraśamana mahākaṣāya |
| Name | वर्ग(हिन्दी) | Varga(Diacritical) | Title (Ref. Book) | Reference Remarks |
|---|---|---|---|---|
| Abhayadivarga | अभयादिवर्ग | Abhayādivarga | ||
| Guduchyadivarga | गुडूच्यादिवर्ग | Guḍūcyādivarga | ||
| Guduchyadivarga | गुडूच्यादिवर्ग | Guduchyadivarga | ||
| Oshadhivarga | ओषधिवर्ग | Oṣadhivarga | ||
| Shatahvadivarga | शताह्वादिवर्ग | Śatāhvādivarga |
Properties
| Name | रस (हिन्दी) | Rasa (Diacritical) | Title (Ref. Book) | Author (Ref. Book) | Publisher (Ref. Book) | Reference Remarks |
|---|---|---|---|---|---|---|
| Tikta | तिक्त | Tikta | ||||
| Katu/Ushana | कटु/उषण | Kaṭu/Uṣaṇa |
| Name | गुण(हिन्दी) | Guna(Diacritical) | Title (Ref. Book) | Reference Remarks |
|---|---|---|---|---|
| Laghu/ Aguru | लघु | Laghu | ||
| Ruksha | रुक्ष | Rukṣa | ||
| Tikshna | तीक्ष्ण | Tīkṣṇa |
| Name | विर्य (हिन्दी) | Virya (Diacritical) | Title (Ref. Book) | Reference Remarks |
|---|---|---|---|---|
| Ushna Virya | उष्ण वीर्य | Uṣṇa vīrya |
| Name | विपाक (हिन्दी) | Vipaka(Diacritical) | Title (Ref. Book) | Reference Remarks |
|---|---|---|---|---|
| Katu vipaka | Kaṭu vipāka | कटु विपाक |
| Name | कर्म (हिन्दी) | Karma (Diacritical) | Title (Ref. Book) | Reference Remarks |
|---|---|---|---|---|
| Dipana | दीपन | dīpana | ||
| Pachana | पाचन | pācana | ||
| Amadoshahara/ Amanashana/ Amapachana/ Amadoshanashaka | आमदोषहर/ आमनाशन/ आमपाचन/ आमदोषनाशक | āmadoṣahara/ āmanāśana/ āmapācana/ āmadoṣanāśaka | ||
| Kanthya | कण्ठ्य | kaṇṭhya | ||
| Shothahara/ Shophaghna/ Shothaghna/ Shvayathuhara | शोथहर/ शोफघ्न/शोथघ्न/ श्वयथुहर | śothahara/ śophaghna/śothaghna/ śvayathuhara |
| Name | दोषकर्म (हिन्दी) | Doshakarma (Diacritical) | Title (Ref. Book) | Reference Remarks |
|---|---|---|---|---|
| KaphaVatahara/KaphaVatashamana/ KaphaVstasaṃshamana | कफवातहर/ कफवातशमन/ कफवातसंशमन | KaphaVātahara/KaphaVātaśamana/ KaphaVātasaṃśamana |
Usage
| Name | Dosage(Form) | Dosage(Reference) | Title (Ref. Book) | Reference Remarks |
|---|---|---|---|---|
| Vyaghri Taila | Taila | Ayurvedic Formulary of India (AFI), Part II, 8:16 | ||
| Vyaghri Haritaki | Avaleha/Leha/Paka | Ayurvedic Formulary of India (AFI), Part II, 3:6 | ||
| Vishnu Taila | Taila | Ayurvedic Formulary of India (AFI), Part II, 8:15 | ||
| Panchatikta Ghrita | Ghrita | Ayurvedic Formulary of India (AFI), Part I, 6:26 | ||
| Mushikadya Taila | Taila | Ayurvedic Formulary of India (AFI), Part II, 8:13 | ||
| Dashamularishta | Arishta | Ayurvedic Formulary of India (AFI), Part I, 1:18 |
| Name | Title (Ref. Book) | Reference Remarks |
|---|---|---|
| Kāsa | ||
| Agnimāndya | ||
| apasmāraḥ | ||
| apatānakaḥ | ||
| Arśa | ||
| hikkā (hidhmā) | ||
| kṛmidantakaḥ | ||
| Pratiśyāyaḥ | ||
| vibandha |
Dose
| Name | Title (Ref. Book) | Reference Remarks |
|---|---|---|
| Decoction/ Kvatha- 40-80ml |
Pharmacopoeial Status
| Name | Title (Ref. Book) | Reference Remarks |
|---|---|---|
| The Ayurvedic Pharmacopoeia of India, part-I, Volume I, Pg..No.-59 (Whole plant) | ||
| The Ayurvedic Pharmacopoeia of India, part-I, Volume VIII, Pg..No.-114 (Whole plant) |
Classical Verses Related to Therapeutic Indications
| Vyadhi / Diseases | Context / Formulation | Shloka / Verse | Reference |
|---|---|---|---|
| अर्श | कण्टकार्या श्रृतं वापि श्रृतं नागरधान्यकै:। अनुपानं भिषग दघाद् वातवर्चोऽनुलोमनम्॥ | (च. चि. १४. १२९) | |
| अर्श | मथितं भाजने क्षुद्रबृहतीफलेपिते। निशां पर्युषितं पेयमिच्छदभि: गुदजक्षयम्। | (अ. ह्र. चि. ८. ४४) | |
| कास | कासे निदिग्धिका | (अ. ह्र. उ. ४०. ५६) | |
| कास | कण्टकारीरसे सिद्दो मुदगयूष: सुसंस्कृत:। सगौरामलक: साम्ल: सर्वकासभिषग्जितम्॥ | (च. चि. १८. १८४) | |
| कास | कण्टकारीघृतम्॥ | (च. चि. १८ ३५, १२५-२८) | |
| कास | व्याध्रिकास्वरससिद्दघृतं वा कासमर्दवृषभृडरसैर्वा। पक्वतैलं निलोद्भवकासं नाशयत्यमभयालवणं वा। | (क. का. १६. २०) | |
| कास | कण्टकारीकॄत: क्वाथ: सकृष्ण: सर्वकासहा। | (वृ. मा. ११. ३१ च. द. १९ २५; वै. जी. ३. ९) | |
| कास | पचेत क्षुद्रां सपञ्चाडा पुटपाकेन तदरस:॥ पिप्पलीचूर्णसंयुक्त: कासश्वासकफापह:॥ | (शा. सं २.१. ३५) | |
| कास | निदिग्धिकामृताशुण्ठीकषायं पाययेद् भिषक॥ पिप्पलीचूर्णसंयुक्तं श्वास्कासार्दितापहम्॥ पीनसारुचिवैस्वर्यशूलाजीर्णज्वरच्छिदम्॥ | (शा. सं. २.२. ४८) | |
| श्वास | निदिग्धिकां चामलकप्रमाणां हिंग्वर्धयुक्तां मधुना सुयुक्ताम्॥ लिहन्नर: श्वासनिपीडितो हि श्वासं जयत्येव बलात् त्र्यहेण॥ | (सु. उ ५१. ५५) | |
| पीनस | व्याघ्रीतैलम् | (शा. स. २. ९. १८०) | |
| उदावर्त्त | यवप्रस्थं फलै: सार्ध कण्टकार्या जलाढके। पक्त्वार्धप्रस्थशेषं तु पिबेद्दिड्गसमन्वितम्॥ | (सु. उ. ५५. ५०) | |
| ज्वर | बस्तिपार्श्वशिर: शूली व्याघ्रीगोक्षुरसाधिताम्॥ | (अ. ह्र चि. १. २८) | |
| अपस्मार | नावनं स्वरसै: खर्चकण्टकारीफलोदभवै:। अपस्मारं विनिर्धूय सघो बोधाय कल्पते॥ | (सि. भे. ४. ४५६) | |
| मूत्राघाते | कण्टकारिकास्वरसं वा समक्षिकम्॥ | (अ. सं. चि. १३. ५; अ. ह्र चि. ११ ११; ग. नि. २. २८. २९) | |
| सितातुल्यो यवक्षार: सर्वकृच्छ्रविनाशन:। निदिग्धिकाया: स्वरस< पिबेत् कुडवसंमितम्। मूत्रदोषहरं कल्यम् | (सु. उ. ५८, ३९) | ||
| अशमरी | मूलं श्र्वदंष्ट्रेक्षुरकोरुबूकात् क्षीरेण पिष्टं बृहतीद्वयञ्च। आलोड्य दघ्ना मधुरेण् पेयं दिनान सप्तास्म्रिभेदनाय्॥ | (च. चि. २६. ६२) | |
| तृष्णा | तृष्यते सलिलं चास्मै………….कण्टकार्याऽथवा श्रृतम्॥ | (च. चि. १२) | |
| अलस | सिद्दं रसे कण्टकार्यास्तैलं वा सार्षपं हितम्॥ | (सु. चि. २० २२) | |
| वाताभिष्यन्द नेत्ररोग | कण्टकार्याश्र्च मूलेषु सुखोष्णं सेचन हितम्॥ | (सु.. उ. ९. १२) | |
| शिशूनां चिरज कास | व्याघ्रीकुसुमंजातकेसरैरवलेहिकाम्। जग्ध्वाऽपि चिरजं जातं शिशो: कासं व्यपोहति॥ | (बं. से. बालरोग. ५९; भा. प्र. चि. ७१. १६१) | |
| कर्णरोग | कण्टकारीमजाक्षीरे पक्त्वा क्षीरेण तेन च। विपचेत् कुक्कुटवसाम् कर्णयोस्तत् प्रपूरणम्॥ | (सु. उ. २१. १३) | |
| पुंसवन | क्षीरेण श्वेतबृहतीमूलं नासापुटे स्वयम्। पुत्रार्थ दक्षिणे सिञ्चेद वामे दुहितॄवाञ्छया॥ | (अ. ह्र. शा. १. ४०) |
Classical Verse From Nighantu
| Source | Varga | Verse |
|---|---|---|
| राजनिघण्टु | शताह्वादिवर्ग | कण्टकारी कण्टकिनी दुःस्पर्शा दुष्प्रधर्षिणी | क्षुद्रा व्याघ्री निदिग्धा च धाविनी क्षुद्रकण्टिका ||३०|| बहुकण्टा क्षुद्रकण्टा ज्ञेया क्षुद्रफला च सा | कण्टारिका चित्रफला स्याच्चतुर्दशसञ्ज्ञका ||३१|| कण्टकारी कटूष्णा च दीपनी श्वासकासजित् | प्रतिश्यायार्तिदोषघ्नी कफवातज्वरार्तिनुत् ||३२|| |
| मदनपालनिघण्टु | अभयादिवर्ग | कण्टारिका कण्टिकिनी कण्टकारी निदिग्धिका | दुःस्पर्शा धावनी क्षुद्रा स्याद् व्याघ्री दुष्प्रधर्षिनी | सिता क्षुद्रा चन्द्रहासा लक्ष्मणा स्वेददूतिका ||६७|| कण्टकारी सरा तिक्ता कटुका दीपनी लघुः ||६८|| रूक्षोष्णा पाचनी कासश्वासज्वरकफानिलान् ||६९|| निहन्ति पीनसं पार्श्वपीडाकृच्छ्रहृदामयान् | तद्वत्प्रोक्ता सिता क्षुद्रा विशेषाद्गर्भकारिणी ||७०|| |
| भावप्रकाशनिघण्टु | गुडूच्यादिवर्ग | कण्टकारी तु दुःस्पर्शा क्षुद्रा व्याघ्री निदिग्धिका | कण्टालिका कण्टकिनी धावनी बृहती तथा ||३३|| क्षुद्रा या क्षुद्रभद्राख्या बृहतीति निगद्यते | श्वेता क्षुद्रा चन्द्रहासा लक्ष्मणा क्षेत्रदूतिका | गर्भदा चन्द्रमा चन्द्री चन्द्रपुष्पा प्रियङ्करी ||३४|| कण्टकारी गुण- कण्टकारी सरा तिक्ता कटुका दीपनी लघुः | रूक्षोष्णा पाचनी कासश्वासज्वरकफानिलान् ||३५|| निहन्ति पीनसं श्वासपार्श्वपीडाहृदामयान् | तयोः फलं कटु रसे पाके च कटुकं भवेत् | शुक्रस्य रेचनं भेदि तिक्तं पित्ताग्निकृल्लघु ||३६|| हन्यात्कफमरुत्कण्डूकासमेदकृमिज्वरान् | तद्वत्प्रोक्ता सिता क्षुद्रा विशेषाद्गर्भकारिणी ||३७|| |
| धन्वन्तरिनिघण्टु | गुडूच्यादिवर्ग | कण्टकारी तु दुःस्पर्शा क्षुद्रा व्याघ्री निदिग्धिका | कण्टालिका कण्टकिनी धावनी दुष्प्रधर्षिणी ||१०८|| कण्टकारी कटुस्तिक्ता तथोष्णा श्वासकासजित् | अरुचिज्वरवातामदोषहृद्गदनाशिनी ||१०९|| कण्टकारीद्वयं तिक्तं वातामकफकासजित् | फलानि क्षुद्रिकाणां तु कटुतिक्तज्वरापहा | कण्डूकुष्ठकृमिघ्नानि कफवातहराणि च ||११०|| |
| कैयदेवनिघण्टु | ओषधिवर्ग | कण्टकारी कण्टकिनी कण्टालुः क्षुद्रकण्टकी | प्रचोदनी बहुगुहा कुली क्षुद्रा निदिग्धिका ||५२|| वार्ताकी धावनी व्याघ्री दुःस्पर्शा दुःप्रधर्षिणी | श्वेतपुष्पा कण्टकारी- सितसिंही चन्द्रपुष्पी क्षुद्रमाता प्रियङ्करी ||५३|| दुर्लभा वनजा क्षुद्र दूतिका श्वेतलक्ष्मणा | कण्टकारी कटुस्तिक्ता रूक्षोष्णा भेदनी लघुः ||५४|| दीपनी पाचनी हन्यात् कफवातज्वरारुचीः | हृद्रोगश्वासकासाश्मपार्श्वरुक्कृच्छ्रपीनसान् ||५५|| तयोः फलं विपाके च कटुकं कटुकं रसे | भेदनं रोचनं हृद्यं तिक्तं पित्ताग्निकृल्लघु ||५६|| हन्यात् श्लेष्ममरुत्कण्डूकासमेहकृमिज्वरान् | तथा च तन्त्रान्तरे - सिंही च बृहती चैव कण्टकारी निदिग्धिका ||५७|| वल्लीवृक्षबृहत्यौ च श्वेतालाबुफला तथा | तथैवाम्लबृहत्यश्च बृहती जलजा तथा ||५८|| अन्याः स्थूलबृहत्यश्चात्रैकादश उदीरिता | तथा च तन्त्रान्तरे - सिंहीबृहत्यौ विज्ञेये रसतः कटुतिक्तके ||५९|| कफवातहरे तत्र सिंही सोष्णा तु पित्तनुत् | निदिग्धिकाकण्टकार्योः फलं सोष्णं तयोरपि ||६०|| कासश्वासापहा तत्र कण्टकारी तयोर्वरा | शेषास्तु चाक्षुषा बल्या वातपित्तनिबर्हणाः ||६१|| श्लेष्मलाः क्लेदजननाः मधुराः गुरुबृंहणाः | श्वेताफलं भेदि निहन्ति कासश्वासक्षयार्शःकृमिवातरोगान् | पित्तप्रदं वह्निकरं कटूष्णं क्षारं कषायं कटुकं कफघ्नम् ||६२|| सिंहीफलं कोमलमग्निसादश्वासत्रिदोषान् हरते लघूष्णम् | रुचिकृद् गुरु विष्टम्भि दग्धभूबृहतीफलम् | फलमम्लबृहत्यास्तु पित्तश्लेष्मकरं लघु ||६३|| अम्लं रुचिकरं हृद्यं वातघ्नं कृमिनाशनम् | वातपित्तप्रशमनमभिष्यन्दकरं गुरु ||६४|| बल्यं कफकरं हृद्यं नादेयबृहतीफलम् | श्लेष्मलं सृष्टविण्मूत्रं शीतलं गुरु बृंहणम् ||६५|| वातपित्तहरं वृष्यमनल्पबृहतीफलम् | वल्लीसिंहीफलं श्लेष्मकरं गुर्वग्निमान्द्यकृत् | आमकृद् वातलं कण्डूजननञ्च प्रसेककृत् ||६६|| शीतं विपाके मधुरं तु वृष्यं श्लेष्मावहं पिच्छिलमामनन्ति | वाते च पित्ते च हितं बृहत्याः फलं सुपक्वं रुचिकृच्च हृद्यम् ||६७|| |