Vernacular Names
Teteli, , Teteli, Tamar
Tetula, Tetula, Tentul, Ambli
Tamarind tree
Anvali
Imli
Hunisemale
Chinch
Koina, Omlika
Imli, Amli
Amlika, Tintidika
Puli, Aanvilam
Chint, Chinta
Imli
Relational Concept Map
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🌱 Plant Information
Etymology
| Sanskrit Synonym | Sanskrit (Diacritical) | Reference | Etymology (Sanskrit) | English Meaning |
|---|---|---|---|---|
| अम्लिका | Amlikā | अम्लो रसोऽस्त्यस्याः । | ||
| चिञ्चा | Ciñcā | चीयन्ते फलान्यस्याः, ‘चिञ् चायने’ । | ||
| तिन्तिडी | Tintiḍī | तिम्यत्यतिशयेनार्द्रीभवति मुखं यया, ‘तिम आर्द्रीभावे’ । |
Classifications
| Name | उपयोगी हिस्सा(हिन्दी) | Part Used(Diacritical) | Title (Ref. Book) | Reference Remarks |
|---|---|---|---|---|
| Fruit pulp | फलमज्जा | Phalamajjā |
| Name | वर्ग(हिन्दी) | Varga(Diacritical) | Title (Ref. Book) | Reference Remarks |
|---|---|---|---|---|
| Oshadhivarga | ओषधिवर्ग | Oṣadhivarga | ||
| Amradiphalavarga | आम्रादिफलवर्ग | Āmrādiphalavarga | ||
| Amradivarga | आम्रादिवर्ग | Āmrādivarga | ||
| Phaladivarga | फलादिवर्ग | Phalādivarga | ||
| Amradivarga | आम्रादिवर्ग | Amradivarga | ||
| Amradivarga | आम्रादिवर्ग | Āmrādivarga |
Properties
| Name | रस (हिन्दी) | Rasa (Diacritical) | Title (Ref. Book) | Author (Ref. Book) | Publisher (Ref. Book) | Reference Remarks |
|---|---|---|---|---|---|---|
| Amla | अम्ल | Amla | ||||
| Madhura/Svadu | मधुर/स्वादु | Madhura/Svādu | ||||
| Kashaya/Tuvara | कषाय/तुवर | Kaṣāya/Tuvara |
| Name | गुण(हिन्दी) | Guna(Diacritical) | Title (Ref. Book) | Reference Remarks |
|---|---|---|---|---|
| Guru | गुरु | Guru | ||
| Ruksha | रुक्ष | Rukṣa | ||
| Sara | सर | Sara |
| Name | विर्य (हिन्दी) | Virya (Diacritical) | Title (Ref. Book) | Reference Remarks |
|---|---|---|---|---|
| Ushna Virya | उष्ण वीर्य | Uṣṇa vīrya |
| Name | विपाक (हिन्दी) | Vipaka(Diacritical) | Title (Ref. Book) | Reference Remarks |
|---|---|---|---|---|
| Amla vipaka | Amla vipāka | अम्ल विपाक |
| Name | कर्म (हिन्दी) | Karma (Diacritical) | Title (Ref. Book) | Reference Remarks |
|---|---|---|---|---|
| Kaphavatahara/ Vatakaphaghna/ Kaphavatahara/ Kaphavatahrrita/ Kaphavatajita/ Kaphavatanuta/ Kaphavat | कफवातहर/ वातकफघ्न/ कफवातहर/ कफवातहृत/ कफवातजित/ कफवातनुत/ कफवातशामक | kaphavātahara/ vātakaphaghna/ kaphavātahara/ kapha | ||
| Dipana | दीपन | dīpana | ||
| Bastishodhaka | बस्तिशोधक | bastiśodhaka | ||
| Bhedana | भेदन | bhedana | ||
| Vishtambhakara | विष्टम्भकारा | viṣṭambhakārā | ||
| Hridya/ Hridayam (Saumanasyakara) | हृद्य/ हृदयं (सौमनस्यकर) | hṛdya/ hṛdayaṃ (saumanasyakara) |
| Name | दोषकर्म (हिन्दी) | Doshakarma (Diacritical) | Title (Ref. Book) | Reference Remarks |
|---|---|---|---|---|
| KaphaVatahara/KaphaVatashamana/ KaphaVstasaṃshamana | कफवातहर/ कफवातशमन/ कफवातसंशमन | KaphaVātahara/KaphaVātaśamana/ KaphaVātasaṃśamana |
Usage
| Name | Dosage(Form) | Dosage(Reference) | Title (Ref. Book) | Reference Remarks |
|---|---|---|---|---|
| Gudapippali | Avaleha/Leha/Paka | Ayurvedic Formulary of India (AFI), Part I, 3:8 | ||
| Shankha Vati | Gutika/Vati/Gulika | Ayurvedic Formulary of India (AFI), Part I, 12:32 |
| Name | Title (Ref. Book) | Reference Remarks |
|---|---|---|
| Udararoga | ||
| Aganimandya | ||
| Arochaka | ||
| Paktishula | ||
| Trishna | ||
| Klama | ||
| Shrama | ||
| Bhranti | ||
| Krimi | ||
| karnashoola | ||
| Nadivrana |
Dose
| Name | Title (Ref. Book) | Reference Remarks |
|---|---|---|
| Fruit pulp/Phala majja-4-10gm |
Pharmacopoeial Status
| Name | Title (Ref. Book) | Reference Remarks |
|---|---|---|
| The Ayurvedic Pharmacopoeia of india,Part-I,Vol.-IV,Pg. No.16(Fruit pulp) |
Classical Verses Related to Therapeutic Indications
| Vyadhi / Diseases | Context / Formulation | Shloka / Verse | Reference |
|---|---|---|---|
| अरुचौ | अम्लिका गुडतोयश्र्च त्वगेलामरिचान्वितम्। अभक्तच्छन्दरोगेषु शस्तं कवलधारणम्॥ | (वृ. मा. १४. ६) | |
| अतिसार | चिञ्चाबीजत्वचं विश्वं सैन्धवं दीप्यकन्तथा। पिबेदामेन तक्रेण सोऽतिसारं जयेत् क्षणात्॥ | (वै. म. ६. ५) | |
| रक्तार्श | चिञ्चाकिसलयकल्को जललुलित: पट्ट्पाविअ: सपटु:। रुधिरात्मकानि हन्यादर्शास्यासामयोगिनिर्दिष्ट:॥ | (सि. भे. ४. २२६) | |
| रक्तार्श | ……………………….. तथाऽम्लिकाम्। दधिदाडिमसिदानि भृष्टानि यमकेऽपि च। धान्यनागरयुक्तानि शाकान्येतानि दापयेत्॥ | (च. चि. १४. १२४-२५) | |
| रक्तार्श | वृक्षाम्ल…………अम्लीकाम्लां सकोलाम्लाम्। ………………दघाद यमकेन भर्जितां पेयाम्॥ | (च. चि. १४. २००. २०१) | |
| गुदभ्रंश | भृष्टै: सदम्लिकाबीजैर्जलघृष्टै: प्रलेपितम्। अथो न भ्रंशते जातु गुदचक्रं प्रवेशितम्॥ | (सि. भे. ४. ९१९) | |
| कास | चिञ्चात्वगेका द्विनिशा त्रिसर्जैकपुनर्नवा। नवजातिदला वर्ति: कासजिद बाह्यधूपिता॥ | (वै. म ३. १२) | |
| सघोव्रण | सघोऽभिघातजनिता आगन्तुश्वयथव: प्रशाम्यन्ति। पिष्टकलवणालेपादम्लईकाफलरसाभ्यां वा॥ | (भा. प्र. चि. ४८. ९९) | |
| सघोव्रण | चिञ्चाफलमांसरसं भूमौ क्षिप्त्वा विमर्घ करतलत:। लिम्पेच्चूर्णसहितं तापय शिखिलाऽभिघातपीडायाम्॥ | (सि. भे. ४. ७०५) | |
| भग्न | अम्लीकाफलकल्कै: सौर्वरिस्तैलमिश्रितै: स्वेदात्। भगनाभिहतरुजाघ्नैरथवौषधसाधितं श्वयतौ॥ | (भा. प्र. चि. ४८. ३२) | |
| न्यच्छव्यङ्गनीलिका | अम्लिकामूलेन वा (लेपयेत्) । | (अ. सं. उ. ३७. २३) | |
| सोमरोग | पूर्व् तोये वासरें वासितानां चिञ्चास्थीनां दुग्धकल्कीकृतानाम्। पीत्वा स्यातां सुन्दरीपुरुषौ द्रागस्थिस्रावात सोमरोगाच्च मुक्तौ॥ | (वै. म. २. १३) | |
| मसूरिकायाम् | निशाचिञ्चाच्छदे शीतवारिपाते तथैव तु॥ | (च. द. ५४. ९) | |
| प्रतिश्याय | प्रतिश्याये नवे शस्तो यूषश्र्चिञ्चाफलोद्भव:॥ तत: पक्वं कफं ज्ञात्वा हरेच्छीर्षविरेचनै:॥ | (च. द. ५८. २०) | |
| गुल्म | वज्रीपलाशशिखरिचिञ्चार्कतिलनालजा:। यवज: स्वर्जिका चेति क्षारा अष्टौ प्रकीर्त्तिता:॥ एते गुल्महरा: क्षारा: | (भा. प्र. चि. ३२. ३४) | |
| वातव्याधी | तिन्तिडीकदलै: सिद्दं ताललिण्डिकया सह॥ पिष्ट्वा सुखोष्णमालेपं दघाद वातरुजापहम्॥ | (बं. से. वातव्याधि ३७) | |
| वातव्याधी | पिष्ट्वा सुखोष्णमालेपं दघाद् वातरुजापहम्॥ | (बं से. वातव्याधि. ३७) | |
| वातव्याधी | स्तब्धगात्रमनिलान् महाबलाद् भृष्टधान्यतिलवातहस्थिभि:। लिप्तमाशु वशमानयेच्छनै: तिन्तिडीत्वगनलेन तापितै:॥ | (वै. म. १२. २२) | |
| शोथ | संस्वेदनक्रिया कार्या….. अथवा तिन्तिडीच्छदै:॥ | (हा. सं ३. २५. १६) | |
| नेत्ररोग | चिञ्चापत्रस्वरसं पयसा संयोज्य घर्षितं कंसे। लिप्तं बहिर्नयनयो: शमयति रागाश्रुतोदसंरम्भान॥ | (वै. म. १६. २३) | |
| नेत्ररोग | चिञ्चास्वरसनिघृष्टं मरिचं सायन्तने तथा साज्यम्॥ अक्षिनिषिक्तं शमयति कण्डूं तिमिरञ्च वातोत्थम्॥ | (वै. म. १६. ३४) | |
| नेत्ररोग | काञ्जिकायससंपिष्टं कंसाभ्यां घर्षितं बहिर्लिप्तम। चिञ्चास्थ्यडकुरमचिराद् बालस्य कुकूणकं जयति॥ | (वै. म. १६. १०) | |
| कर्णरोग | चिञ्चाफलस्वरससाधिततैलमग्य्रम …..कर्णे सशूलिनि | (वै. म. १६. ६१) | |
| दद्रु | चिञ्चापत्रारसं वा कण्डूतिनाशमन्विच्छन | (वैं म. ११. ६२) | |
| सर्पविष | लवणार्धपलोपेत: चिञ्चापल्लवजो रस:। कुडवप्रमित: पीतो विषं हन्ति फणाभृताम्॥ | (वै. म. १९. ३८) |
Classical Verse From Nighantu
| Source | Varga | Verse |
|---|---|---|
| कैयदेवनिघण्टु | ओषधिवर्ग | सिञ्चाम्लोम्लान्तिकी बीत शुक्ता चण्डा च चुक्रिका | अम्ला स्तम्भैनिका चुक्रा तिन्तिडी तिन्त्रिणी तथा ||३६३|| चिञ्चाम्लोष्णा गुरुर्वातहरी पित्तकफास्रदा | तिन्तिणीकुसुमं स्वादु कषायाम्लं रुचिप्रदम् ||३६४|| कफमारुतमेहघ्नं विशदं दीपनं लघु | तिन्तिडीकफलं बालमसृक्पित्तबलासकृत् ||३६५|| ग्राह्युष्णं दीपनं रुच्यं मध्यमं कफवातनुत् | तद्वत् पक्वा सरा रूक्षा रुच्याग्निवस्तिशुद्धिकृत् ||३६६|| हृद्या कफघ्नी शुष्कैवं तृट्क्लमश्रमजिल्लघुः | वातश्लेष्मकरं ज्ञेयं नवं तिन्तिडिकाफलम् ||३६७|| सम्वत्सरस्थितं तत्तु पित्तघ्नमनिलापहम् |३६८| |
| धन्वन्तरिनिघण्टु | आम्रादिवर्ग | अम्लिका चुक्रिका चुक्रा साम्ला शुक्ताऽथ शुक्तिका | अम्लिका चिञ्चिका चिञ्चा तिन्तिडीका सुतित्तिडी ||३३|| अम्लिकायाः फलं चाम्लमत्यन्तं पित्तकृल्लघु | रक्तकृद्वातशमनं बस्तिशुद्धिकरं परम् ||३४|| पक्वं तु मधुराम्लं च भेदि विष्टम्भि वातजित् | त्वक्भस्म स्यात्कषायोष्णं कफघ्नं त्वनिलापहम् ||३५|| |
| भावप्रकाशनिघण्टु | आम्रादिफलवर्ग | अम्लिका चुक्रिकाम्ली च चुक्रा दन्तशठापि च | अम्ला च चिञ्चिका चिञ्चा तिन्तिडीका च तिन्तिडी ||११६|| अम्लिकाऽम्ला गुरुर्वातहरी पित्तकफास्रकृत् | पक्वा तु दीपनी रूक्षा सरोष्णा कफवातनुत् ||११७|| |
| मदनपालनिघण्टु | फलादिवर्ग | अम्लिका चुक्रिका चिञ्चा तिन्तिडी शुक्तिचन्द्रिका | अम्लिकाऽऽमा गुरुर्वातहरा पित्तकफास्रजित् ||८६|| पक्वा तद्वत्सरा रुच्या वह्निबस्ति विशुद्धिकृत् | शुष्का हृद्या श्रमभ्रान्तितृष्णाक्लमहरा लघुः ||८७|| |
| राजनिघण्टु | आम्रादिवर्ग | चिञ्चा तु चुक्रिका चुक्रा साम्लिका शाकचुक्रिका | अम्ली सुतिन्तिडी चाम्ला चुक्रिका च नवाभिधा ||१६२|| चिञ्चाऽत्यम्ला भवेदामा पक्वा तु मधुराम्लिका | वातघ्नी पित्तदाहास्रकफदोषप्रकोपणी ||१६३|| अम्लिकायाः फलं त्वाममत्यम्लं लघु पित्तकृत् | पक्वं तु मधुराम्लं स्याद्भेदि विष्टम्भवातजित् ||१६४|| पक्वचिञ्चाफलरसो मधुराम्लो रुचिप्रदः | शोफपाककरो लेपाद्व्रणदोषविनाशनः ||१६५|| चिञ्चापत्रञ्च शोफघ्नं रक्तदोषव्यथापहम् | तस्याः शुष्कत्वचाक्षारं शूलमन्दाग्निनाशनम् ||१६६|| |
| सोढलनिघण्टु | आम्रादिवर्ग | अम्लिकायां तु चुक्रा च चुक्रिका शुक्तिका तथा | अम्लिकाऽम्ला च शुक्ता च चिञ्चा तिन्तिडिका तथा ||५६९|| |