Vernacular Names
Shilikha
Haritaki
Chebulik Myrobalan
Hirdo, Himaja, Pulo-harda
Harre, Harad, Harar
Alalekai
Hirda, Haritaki, Harda, Hireda
Harida
Halela, Harar
Abhayā, Kāyasthā, Śivā, Pathyā, Vijayā, Putana, Haimvati, Avyatha, Chetaki, Rohini
Kadukkai
Karaka, Karakkaya
Halela
Relational Concept Map
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🌱 Plant Information
Etymology
| Sanskrit Synonym | Sanskrit (Diacritical) | Reference | Etymology (Sanskrit) | English Meaning |
|---|---|---|---|---|
| हरीतकी | Harītakī | हरति मलान्, तकति हसति व्याधीन् प्रत्यवज्ञया जज्जेत्रीत्वाच्चेति; ‘हृ हरणे’, ‘तक हसने’ । मदनपालेन तु निरुक्तिरित्थं प्रकटिता –‘हरस्य भवने जाता, हरिता च स्वभावतः । हरते सर्वरोगांश्च ततः प्रोक्ता हरीतकी ।।’ इति । प्रियनिघण्टौ तु-देहे संगं मलानां हरति बहुतरं सा हरीतक्यभिख्या’ इति । | ||
| अभया | Abhayā | न भयं व्याधीनां सेवनादस्याः, रसायनत्वेन व्याधिप्रतिषेधकत्वात् । | ||
| अमृता | Amṛtā | अमृतवत् फलदायिनी, रसायनत्वेन जराव्याधि प्रतिषेधात् । | ||
| अमोघा | Amoghā | अव्यर्था । | ||
| अव्यथा | Avyathā | व्यथा शूलं रोगो वा; न व्यथा सेवेननास्याः, शूलहृत्त्वाद् रोगनाशकत्वाच्च । | ||
| कायस्था | Kāyasthā | कायः स्वस्थस्तिष्ठत्वनया, अन्तर्भावितण्यर्थात् ‘कायं तारुण्ये स्थापयतीति, वयःस्थापनीत्यर्थः । | ||
| चेतकी | Cetakī | चेतयति चितं प्रबोधयतीति, यथोक्तं –उन्मीलिनी बुद्धिबलेन्द्रियाणाम्’ इति । | ||
| जीवन्ती | Jīvantī | जीवन्तं पुरुषं यापयति, स्वास्थ्यकरत्वात् आयुष्करत्वाच्च । | ||
| पञ्चभद्रिका | Pañcabhadrikā | पञ्च भद्रा रसा अस्याः । | ||
| पथ्या | pathyā | पथिभ्यः स्रोतोभ्यो हिता, पथोऽनपेता वा; मनःशरीरानुपघातिनीत्यर्थः । | ||
| पूतना | Pūtanā | पूतं संशुद्धं करोतीति । | ||
| प्रमथा | Pramathā | प्रमथ्नाति दोषान् निर्हरति चेति । | ||
| प्राणदा | Prāṇadā | प्राणं शक्तिं बलञ्च ददातीति । | ||
| रोहिणी | Rohiṇī | क्षतादीन् रोहयतीति; रसायनत्वेन क्षीणान् धातून् रोहयतीति वा । | ||
| वयस्या | Vayasyā | वयसे हिता, वयः स्थापनीत्यर्थः । अथवा-व्यस्या सखी, तद्वनमनःशरीरप्रसादजननी । | ||
| विजया | Vijayā | विशेषेण मूलोच्छेदनतो जयति रोगानिति; यथोक्तं-‘निर्मूलिनी पित्तकफनिलनाम्’ । इति । | ||
| शिवा | Śivā | कलयाणकर्तृत्वात्; हिमवत्प्रदेशे जातत्वेन शिवसाहचर्याच्च । | ||
| श्रेयसी | Śreyasī | अतिप्रशस्ता । | ||
| हैमवती | Haimavatī | हिमवति तदुपत्यकायां जाता । |
Classifications
| Name | उपयोगी हिस्सा(हिन्दी) | Part Used(Diacritical) | Title (Ref. Book) | Reference Remarks |
|---|---|---|---|---|
| Fruit | फल | Phala |
| Name | गण(हिन्दी) | Gana(Diacritical) | Title (Ref. Book) | Reference Remarks |
|---|---|---|---|---|
| आमलक्यादिगण | Āmalakyādigaṇa | Amalakyadigana | ||
| त्रिफला | Triphalā | Triphala |
| Name | महाकषाय (हिन्दी) | Mahakashaya(Diacritical) | Title (Ref. Book) | Reference Remarks |
|---|---|---|---|---|
| Arshoghna Mahakashaya | अर्शोघ्न महाकषाय | Arśoghna mahākaṣāya | ||
| Jvarahara Mahakashaya | ज्वरहर महाकषाय | Jvarahara mahākaṣāya | ||
| Kasahara Mahakashaya | कासहर महाकषाय | Kāsahara mahākaṣāya | ||
| Kushthaghna Mahakashaya | कुष्ठघ्न महाकषाय | Kuṣṭhaghna mahākaṣāya | ||
| Prajasthapano Mahakashaya | प्रजास्थापनो महाकषाय | Prajāsthāpano mahākaṣāya |
| Name | वर्ग(हिन्दी) | Varga(Diacritical) | Title (Ref. Book) | Reference Remarks |
|---|---|---|---|---|
| Abhayadivarga | अभयादिवर्ग | Abhayādivarga | ||
| Amradivarga | आम्रादिवर्ग | Āmrādivarga | ||
| Guduchyadivarga | गुडूच्यादिवर्ग | Guduchyadivarga | ||
| Haritakyadivarga | हरीतक्यादिवर्ग | Harītakyādivarga | ||
| Oshadhivarga | ओषधिवर्ग | Oṣadhivarga |
Properties
| Name | रस (हिन्दी) | Rasa (Diacritical) | Title (Ref. Book) | Author (Ref. Book) | Publisher (Ref. Book) | Reference Remarks |
|---|---|---|---|---|---|---|
| Kashaya/Tuvara | कषाय/तुवर | Kaṣāya/Tuvara | ||||
| Katu/Ushana | कटु/उषण | Kaṭu/Uṣaṇa | ||||
| Tikta | तिक्त | Tikta | ||||
| Amla | अम्ल | Amla | ||||
| Madhura/Svadu | मधुर/स्वादु | Madhura/Svādu |
| Name | गुण(हिन्दी) | Guna(Diacritical) | Title (Ref. Book) | Reference Remarks |
|---|---|---|---|---|
| Laghu/ Aguru | लघु | Laghu | ||
| Ruksha | रुक्ष | Rukṣa |
| Name | विर्य (हिन्दी) | Virya (Diacritical) | Title (Ref. Book) | Reference Remarks |
|---|---|---|---|---|
| Ushna Virya | उष्ण वीर्य | Uṣṇa vīrya |
| Name | विपाक (हिन्दी) | Vipaka(Diacritical) | Title (Ref. Book) | Reference Remarks |
|---|---|---|---|---|
| Madhura vipaka | Madhura vipāka | मधुर विपाक |
| Name | कर्म (हिन्दी) | Karma (Diacritical) | Title (Ref. Book) | Reference Remarks |
|---|---|---|---|---|
| Sarvadoshaprashamana | सर्वदोषप्रशमन | sarvadoṣapraśamana | ||
| Rasayana | रसायन | rasāyana | ||
| Chakshushya | चक्षुष्य | cakṣuṣya | ||
| Dipana | दीपन | dīpana | ||
| Anulomana | अनुलोमन | anulomana | ||
| Hridya/ Hridayam (Saumanasyakara) | हृद्य/ हृदयं (सौमनस्यकर) | hṛdya/ hṛdayaṃ (saumanasyakara) | ||
| Medhya/ Medhakara/ Medhavardhaka | मेध्य/ मेधाकर/ मेधावर्धक | medhya/ medhākara/ medhāvardhaka |
| Name | दोषकर्म (हिन्दी) | Doshakarma (Diacritical) | Title (Ref. Book) | Reference Remarks |
|---|---|---|---|---|
| Sarvadoshahara/Sarvadoshashamana | सर्वदोषहर/सर्वदोषशमन | Sarvadoṣahara/Sarvadoṣaśamana |
Usage
| Name | Dosage(Form) | Dosage(Reference) | Title (Ref. Book) | Reference Remarks |
|---|---|---|---|---|
| Triphaladi Taila | Taila | Ayurvedic Formulary of India (AFI), Part I, 8:21 | ||
| Triphala Churna | Churna | Ayurvedic Formulary of India (AFI), Part I, 7:15 | ||
| Pathyadi Lepa | Lepa/Malahara | Ayurvedic Formulary of India (AFI), Part I, 11:7 | ||
| Dashamula Haritaki | Avaleha/Leha/Paka | Ayurvedic Formulary of India (AFI), Part I, 3:14 | ||
| Danti Haritaki | Avaleha/Leha/Paka | Ayurvedic Formulary of India (AFI), Part I, 3:13 | ||
| Chitraka Haritaki | Avaleha/Leha/Paka | Ayurvedic Formulary of India (AFI), Part I, 3:10 | ||
| Brahma Rasayana | Avaleha/Leha/Paka | Ayurvedic Formulary of India (AFI), Part I, 3:20 | ||
| Agastya Haritaki Rasayana/Agastya Haritaki/Agastya Rasayana | Avaleha/Leha/Paka | Ayurvedic Formulary of India (AFI), Part I, 3:1 | ||
| Abhayarishta | Arishta | Ayurvedic Formulary of India (AFI), Part I, 1:1 | ||
| Abhaya Lavana | Lavana | Ayurvedic Formulary of India (AFI), Part I, 10:3 |
| Name | Title (Ref. Book) | Reference Remarks |
|---|---|---|
| Kāsa | ||
| Arśa | ||
| aruciḥ | ||
| gulmaḥ | ||
| hṛdrogaḥ | ||
| jvaraḥ | ||
| pāṇḍurogaḥ | ||
| Śotha | ||
| Svasa | ||
| udara/udararogaḥ | ||
| udāvartaḥ | ||
| vibandha | ||
| viṣamajvaraḥ |
Dose
| Name | Title (Ref. Book) | Reference Remarks |
|---|---|---|
| Powder/ Curna- 3-6gm | ||
| Powder/ Curna- 3-6gm |
Pharmacopoeial Status
| Name | Title (Ref. Book) | Reference Remarks |
|---|---|---|
| The Ayurvedic Pharmacopoeia of india, Part-I, Vol.-I, Pg. No. 47(Fruit) | ||
| The Ayurvedic Pharmacopoeia of india, Part-I, Vol.-VIII, Pg. No. 89(Fruit) |
Classical Verse From Nighantu
| Source | Varga | Verse |
|---|---|---|
| सोढलनिघण्टु | गुडूच्यादिवर्ग | हरीतक्यां जयां पथ्या प्रपथ्या पूतनाऽमृता | रोहिणी रोपणी चैव सुरभी कालिकाऽमया ||२३१|| हैमवती च कायस्था चेतकी चाव्यथा शिवा | विजया नन्दिनी प्रोक्ता हिमजा रामतूर्यका ||२३२|| जीवन्ती प्राणदा ख्याता वयःस्था चापि श्रेयसी |२३३| |
| राजनिघण्टु | आम्रादिवर्ग | हरीतकी हैमवती जयाऽभया शिवाऽव्यथा चेतनिका च रोहिणी | पथ्या प्रपथ्याऽपि च पूतनाऽमृता जीवप्रिया जीवनिका भिषग्वरा ||२१४|| जीवन्ती प्राणदा जीव्या कायस्था श्रेयसी च सा | देवी दिव्या च विजया वह्निनेत्रमिताभिधा ||२१५|| हरीतकी पञ्चरसा च रेचनी कोष्ठामयघ्नी लवणेन वर्जिता | रसायनी नेत्ररुजापहारिणी त्वगामयघ्नी किल योगवाहिनी ||२१६|| बीजास्थितिक्ता मधुरा तदन्तस्त्वग्भागतः सा कटुरुष्णवीर्या | मांसांशतश्चाम्लकषाययुक्ता हरीतकी पञ्चरसा स्मृतेयम् ||२१७|| हरीतक्यमृतोत्पन्ना सप्तभेदैरुदीरिता | तस्या नामानि वर्णांश्च वक्ष्याम्यथ यथाक्रमम् ||२१८|| विजया रोहिणी चैव पूतना चामृताऽभया | जीवन्ती चेतनी चेति नाम्ना सप्तविधा मता ||२१९|| अलाबुनाभिर्विजया सुवृत्ता रोहिणी मता | स्वल्पत्वक् पूतना ज्ञेया स्थूलमांसाऽमृता स्मृता ||२२०|| पञ्चास्रा चाभया ज्ञेया जीवन्ती स्वर्णवर्णभाक् | त्र्यस्रां तु चेतकीं विद्यादित्यासां रूपलक्षणम् ||२२१|| विन्ध्याद्रौ विजया हिमाचलभवा स्याच्चेतकी पूतना सिन्धौ स्यादथ रोहिणी तु विजया जाता प्रतिस्थानके | चम्पायाममृताऽभया च जनिता देशे सुराष्ट्राह्वये जीवन्ती च हरीतकी निगदिता सप्तप्रभेदा बुधैः ||२२२|| सर्वप्रयोगे विजया च रोहिणी क्षतेषु लेपेषु तु पूतनोदिता | विरेचने स्यादमृता गुणाधिका जीवन्तिका स्यादिह जीर्णरोगजित् ||२२३|| स्याच्चेतकी सर्वरुजापहारिका नेत्रामयघ्नीमभयां वदन्ति | इत्थं यथायोगमियं प्रयोजिता ज्ञेया गुणाढ्या न कदाचिदन्यथा ||२२४|| चेतकी च धृता हस्ते यावत् तिष्ठति देहिनः | तावद्विरेचते वेगात्तत्प्रभावान्न संशयः ||२२५|| सप्तानामपि जातीनां प्रधानं विजया स्मृता | सुखप्रयोगसुलभा सर्वव्याधिषु शस्यते ||२२६|| क्षिप्ताप्सु निमज्जति या सा ज्ञेया गुणवती भिषग्वर्यैः | यस्या यस्या भूयो निमज्जनं सा गुणाढ्या स्यात् ||२२७|| हरते प्रसभं व्याधीन्भूयस्तरति यद्वपुः | हरीतकी तु सा प्रोक्ता तत्र कीर्दीप्तिवाचकः ||२२८|| हरीतकी तु तृष्णायां हनुस्तम्भे ग्रलग्रहे | शोषे नवज्वरे जीर्णे गुर्विण्यां नैव शक्यते ||२२९|| |
| मदनपालनिघण्टु | अभयादिवर्ग | हरस्य भवने जाता हरिता च स्वभावतः | हारयेत्सर्वरोगाञ्च तेन प्रोक्ता हरीतकी ||८|| जीवन्ती पूतना पश्चादमृता विजयाऽभया | रोहिणी चेतकी सप्त भेदभिन्ना हरीतकी ||९|| जीवन्ती जीवनोद्योगात्पावनात्पूतना मता | सुधावदमृता ज्ञेया विजया विजयप्रदा ||१०|| नृणामभयदा यस्मादभया तत् प्रकीर्तिता | रोहिणी तु गुणारोहाच्चेतनाच्चेतकी मता ||११|| जीवन्ती स्वर्णवर्णाभा पूतनाऽस्थिमती मता | अमृता त्रिदला प्रोक्ता विजया तुम्बरूपिणी ||१२|| पञ्चाङ्गी त्वभया ज्ञेयाऽमृता वृत्ता तु रोहिणी | त्र्यङ्गी तु चेतकी ज्ञेया कर्म तासामथोच्यते ||१३|| सर्वरोगेषु जीवन्ती प्रलेपे पूतना हिता | शुद्ध्यर्थममृता प्रोक्ता विजया सर्वरोगहृत् ||१४|| अक्षिरोगेऽभया शस्ता रोहिणी व्रणरोहिणी | चेतकी चूर्णयोगे स्यात्सप्तधैव प्रकीर्तिता ||१५|| नवा स्निग्धा घना वृत्ता गुर्वी क्षिप्ता च याऽम्भसि | निमज्जेत्सा प्रशस्ता स्याद्रोगध्न्यतिगुणप्रदा ||१६|| शोणा च्छिन्ना गुडनिभा किञ्चिदल्पा कषायिणी | स्थूलत्वक् सरसा स्वल्पबीजा गुर्वी हरीतकी ||१७|| चर्विता वर्धयत्यग्निं पेषिता मलशोधिनी | स्विन्ना सङ्ग्राहिणी प्रोक्ता भृष्टा पथ्यान्नदोषनुत् ||१८|| ग्रीष्मे तुल्यगुडां सुसैन्धवयुतां मेघावृते ह्यम्बरे तुल्यां शर्करया शरद्यमलया शुण्ठ्या तुषारागमे | पिप्पल्या शिशिरे वसन्तसमये क्षौद्रेण संयोजितां राजन् प्राप्य हरीतकीमिव रुजो नश्यन्तु ते शत्रवः ||१९|| हरीतकीनामगुण- शिवा हरीतकी पथ्या चेतकी विजया जया | प्रपथ्या प्रथमाऽमोघा कायस्था प्राणदाऽमृता ||२०|| जीवनीया हेमवती पूतना वृतनाऽभया | वयस्था नन्दिनी ज्ञेया श्रेयसी रोहिणी तथा ||२१|| हरीतकी पञ्चरसाऽलवणा तुवरोत्कटा | रूक्षोष्णा दीपनी मेध्या स्वादुपाका रसायनी ||२२|| सरा बुद्धिप्रदायुख्या चक्षुष्या बृंहणी लघुः | श्वासकासप्रमेहार्शः कुष्ठशोफोदरान् कृमीन् ||२३|| वैस्वर्यग्रहणीदोषविबन्धविषमज्वरान् | गुल्माध्मानव्रणच्छर्दिहिध्माकण्डूहृदामयान् | कामलां शूलमानाहं प्लीहानं चापकर्षति ||२४|| मधुराम्लतया वातं कषायस्वादुभावतः | पित्तं हन्ति कफं हन्ति कटुत्वेन हरीतकी ||२५|| |
| भावप्रकाशनिघण्टु | हरीतक्यादिवर्ग | दक्षं प्रजापतिं स्वस्थमश्विनौ वाक्यमूचतुः | कुतो हरीतकी जाता तस्यास्तु कति जातयः ||१|| रसाः कति समाख्याताः कति चोपरसाः स्मृताः | नामानि कति चोक्तानि किं वा तासां च लक्षणम् ||२|| के च वर्णा गुणाः के च का च कुत्र प्रयुज्यते | केन द्रव्येण संयुक्ता कांश्च रोगान्व्यपोहति ||३|| प्रश्नमेतद्यथा पृष्टं भगवन्वक्तुमर्हसि | अश्विनीर्वचनं श्रुत्वा दक्षो वचनमब्रवीत् ||४|| पपात बिन्दुर्मेदिन्यां शक्रस्य पिबतोऽमृतम् | ततो दिव्यात्समुत्पन्ना सप्तजातिर्हरीतकी ||५|| हरीतक्यभया पथ्या कायस्था पूतनाऽमृता | हैमवत्यव्यथा चापि चेतकी श्रेयसी शिवा | वयस्था विजया चापि जीवन्ती रोहिणीति च ||६|| विजया रोहिणी चैव पूतना चामृताऽभया | जीवन्ती चेतकी चेति पथ्यायाः सप्तजातयः ||७|| “विन्ध्याद्रौ विजया हिमाचलभवा स्याच्चेतकी पूतना सिन्धौ स्यादथ रोहिणी निगदिता जाता प्रतिस्थानके | चम्पायाममृताभया च जनिता देशे सुराष्ट्राह्वये | जीवन्तीति हरीतकी निगदिता सप्त प्रभेदा बुधैः”(१) ||७|| अलाबुवृत्ता विजया वृत्ता सा रोहिणी स्मृता | पूतनास्थिमती सूक्ष्मा कथिता मांसलाऽमृता ||८|| पञ्चरेखाऽभया प्रोक्ता जीवन्ती स्वर्णवर्णिनी | त्रिरेखा चेतकी ज्ञेया सप्तानामियमाकृतिः ||९|| विजया सर्वरोगेषु रोहिणी व्रणरोहिणी | प्रलेपे पूतना योज्या शोधनार्थेऽमृता हिता ||१०|| अक्षिरोगेऽभया शस्ता जीवन्ती सर्वरोगहृत् | चूर्णार्थे चेतकी शस्ता यथायुक्तं प्रयोजयेत् ||११|| चेतकी द्विविधा प्रोक्ता श्वेता कृष्णा च वर्णतः | षडङ्गुलायता शुक्ला कृष्णा त्वेकाङ्गुला स्मृता ||१२|| काचिदास्वादमात्रेण काचिद्गन्धेन भेदयेत् | काचित्स्पर्शेन दृष्ट्याऽन्या चतुर्धा भेदयेच्छिवा ||१३|| चेतकीपादपच्छायामुपसर्पन्ति ये नराः | भिद्यंते तत्क्षणादेव पशुपक्षिमृगादयः ||१४|| चेतकी तु धृता हस्ते यावत्तिष्ठति देहिनः | तावद्भिद्येत वेगैस्तु प्रभावान्नात्र संशयः ||१५|| नृपादिसुकुमाराणां कृशानां भेषजद्विषाम् | चेतकी परमा शस्ता हिता सुखविरेचनी ||१६|| सप्तानामपि जातीनां प्रधाना विजया स्मृता | सुखप्रयोगा सुलभा सर्वरोगेषु शस्यते ||१७|| हरीतकी पञ्चरसाऽलवणा तुवरा परम् | रूक्षोष्णा दीपनी मेध्या स्वादुपाका रसायनी | चक्षुष्या लघुरायुष्या बृंहणी चानुलोमिनी ||१८|| श्वासकासप्रमेहार्शःकुष्ठशोथोदरक्रिमीन् | वैस्वर्यग्रहणीरोगविबन्धविषमज्वरान् ||१९|| गुल्माध्मानतृषाछर्दिहिक्काकण्डूहृदामयान् | कामलां शूलमानाहं प्लीहानञ्च यकृत्तथा | अश्मरीमूत्रकृच्छ्रं च मूत्राघातं च नाशयेत् ||२०|| स्वादुतिक्तकषायत्वात्पित्तहृत्कफहृत्तु सा | कटुतिक्तकषायत्वादम्लत्वाद्वातहृच्छिवा ||२१|| पित्तकृत्कटुकाम्लत्वाद्वातकृन्न कथं शिवा | प्रभावाद्दोषहन्तृत्वं सिद्धं यत्तत्प्रकाश्यते | हेतुभिः शिष्यबोधार्थं नापूर्वं क्रियतेऽधुना ||२२|| कर्मान्यत्वं गुणैः साम्यं दृष्टमाश्रयभेदतः | यतस्ततो नेति चिन्त्यं धात्रीलकुचयोर्यथा ||२३|| पथ्याया मज्जनि स्वादुः स्नाय्वामम्लो व्यवस्थितः | वृन्ते तिक्तस्त्वचि कटुरस्थिस्थस्तुवरो रसः ||२४|| नवा स्निग्धा घना वृत्ता गुर्वी क्षिप्ता च याऽम्भसि | निमज्जेत्सा प्रशस्ता च कथिताऽतिगुणप्रदा ||२५|| नवादिगुणयुक्तत्वं तथैवात्र द्विकर्षता | हरीतक्याः फले यत्र द्वयं तच्छ्रेष्ठमुच्यते ||२६|| चर्विता वर्धयत्यग्निं पेषिता मलशोधिनी | स्विन्ना संग्राहिणी पथ्या भृष्टा प्रोक्ता त्रिदोषनुत् ||२७|| उन्मीलिनी बुद्धिबलेन्द्रियाणां निर्मूलिनी पित्तकफानिलानाम् | विस्रंसिनी मूत्रशकृन्मलानां हरीतकी स्यात् सह भोजनेन ||२८|| अन्नपानकृतान्दोषान्वातपित्तकफोद्भवान् | हरीतकी हरत्याशु भुक्तस्योपरि योजिता ||२९|| लवणेन कफं हन्ति पित्तं हन्ति सशर्करा | घृतेन वातजान् रोगान्सर्वरोगान्गुडान्विता ||३०|| सिंधूत्थशर्कराशुण्ठीकणामधुगुडैः क्रमात् | वर्षादिष्वभया प्राश्या रसायनगुणैषिणा ||३१|| अध्वातिखिन्नो बलवर्जितश्च रूक्षः कृशो लङ्घनकर्शितश्च | पित्ताधिको गर्भवती च नारी विमुक्तरक्तस्त्वभयां न खादेत् ||३२|| |
| धन्वन्तरिनिघण्टु | गुडूच्यादिवर्ग | हरीतक्याभया पथ्या प्रपथ्या पूतनाऽमृता | जयाऽव्यथा हैमवती वयःस्था चेतकी शिवा ||२३३|| प्राणदा नन्दिनी चैव रोहिणी विजया च सा | कषायाऽम्ला च कटुका तिक्ता मधुरसान्विता | इति पञ्चरसा पथ्या लवणेन विवर्जिता ||२३४|| अम्लभावाज्जयेद्वातं पित्तं मधुरतिक्तकात् | कफं रूक्षकषायत्वात्त्रिदोषघ्नी ततोऽभया ||२३५|| प्रपथ्या लेखनी लघ्वी मेध्या चक्षुर्हिता सदा | मेहकुष्ठव्रणच्छर्दिशोफवातास्रकृच्छ्रजित् ||२३६|| वातानुलोमनी हृद्या सेन्द्रियाणां प्रसादनी | सन्तर्पणकृतान्रोगान्प्रायो हन्ति हरीतकी ||२३७|| तृष्णायां मुखशोषे च हनुस्तम्भे गलग्रहे | नवज्वरे तथा क्षीणे गर्भिण्यां न प्रशस्यते ||२३८|| हरस्य भवने जाता हरीता च स्वभावतः | सर्वरोगांश्च च हरते तेन ख्याता हरीतकी ||२३९|| |
| कैयदेवनिघण्टु | ओषधिवर्ग | हरीतक्यभया पथ्या प्रपथ्या हैमवत्यपि ||२२१|| कायस्था श्रेयसी ज्ञेया प्राणदा विजया शिवा | जया विलवणा पञ्चरसानु तुवरोत्करा ||२२२|| स्वादुपाकरसायुष्या रूक्षोष्णा बृंहणी लघुः | दीपनी पाचनी मेध्या वयसःस्थापनी परम् ||२२३|| रसायनी च चक्षुष्या बलबुद्धिस्मृतिप्रदा | कुष्ठवैवर्ण्यवैस्वर्यपुराणविषमज्वरान् ||२२४|| शिरोऽक्षिपाण्डुहृद्रोगकामलाग्रहणीगदान् | सशोषशोफातीसारमेहमोहवमिकृमीन् ||२२५|| श्वासकासप्रसेकार्शःप्लीहानाहगदोदरान् | विबन्धं स्रोतसां गुल्ममूरुस्तम्भमरोचकम् ||२२६|| हिध्माध्मानव्रणान् शूलं त्रीन् दोषांश्च व्यपोहति | स्वाद्वम्लभावात्पवनं कटुतिक्ततया कफम् ||२२७|| कषायमधुसत्त्वाच्च पित्तं हन्ति हरीतकी | मज्जवक्स्नायुमांसास्थिस्थिताः पञ्चाभयोद्भवाः ||२२८|| स्वादुकट्वम्लतिक्ताख्यकषायाः क्रमशो रसाः | पथ्यामज्जा च चक्षुष्यो वातपित्तहरो गुरुः ||२२९|| नीरजा वनजा चैव पर्वतीया इति त्रिधा | यथोतरं पथ्यतमा विज्ञेया त्रिविधाभया ||२३०|| कालयोगात्स्वयं पक्वा पतिता च महीतले | नवा स्निधायता वृत्ता गुर्वी क्षिप्ता तथाम्भसि ||२३१|| निमज्जेद्या तथैकस्मिन् फले स्याच्च द्विकर्षता | सर्वदा गुणकृत्सा तु ततोऽन्या तु विवर्जिता ||२३२|| नवादिगुणयुक्तत्वं तथैकत्वं द्विकर्षता | हरीतक्याः फले यत्र तत्सर्वं गुणकृद् भवेत् ||१३३|| जन्तुजग्धा दवादग्धां जले पङ्के स्थितां पुनः | ऊषरे च स्थितां भिन्नां वर्जयेत्तु हरीतकीम् ||२३४|| |