Vernacular Names
Sonaroo
Sonaalu
Indian Laburnum, Purging Fistula, Pudding pipe tree
Garmaalo
Amaltaas, Girimaal
Kakke, Kakkemar
Baahvaa
Sunaari
Amaltaas, Kaniyaar, Girdnalee
Kr̥tamāla, Śampāka, Vyādhighāta, Śamyāka, Ṇrpadruma, Kr̥tamālaka, Rājavr̥kṢa, Chaturangula, Aragvadha
Konnai
Rela
Amaltaas
Relational Concept Map
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🌱 Plant Information
Etymology
| Sanskrit Synonym | Sanskrit (Diacritical) | Reference | Etymology (Sanskrit) | English Meaning |
|---|---|---|---|---|
| आरग्वधः | Āragvadhaḥ | आ समन्ताद् रुजां वधोऽत्र । | ||
| आमहा | Āmahā | आमं हन्ति । | ||
| आरेवतः | Ārevataḥ | आरेवयति निःसारयति मलम्, ‘रेवृ गतौ’ । | ||
| आरोग्यशिम्बी | Ārogyaśimbī | आरोग्यप्रदः शिम्बः फलमस्य । | ||
| कर्णाभरणः | Karṇābharaṇaḥ | कर्णयोराभरणरूपेण प्रयुज्यते । | ||
| कुष्ठसूदनः | Kuṣṭhasūdanaḥ | कुष्ठं सूदयतीति | ||
| कृतमालः | Kṛtamālaḥ | कृता धारिता माला पुष्पाणामनेन । | ||
| चतुरङ्गुलः | Caturaṅgulaḥ | चतस्रोऽङ्गुलयः प्रमाणमस्य पर्वणः, चतुरङ्गुलमितानि फलमज्जपर्वाणीत्यर्थः | ||
| ज्वरान्तकः | Jvarāntakaḥ | ज्वरनाशकः । | ||
| दीर्घफलः | Dīrghaphalaḥ | दीर्घ फलं यष्टिवदस्य । | ||
| प्रग्रहः | pragrahaḥ | प्रकर्षेण गृह्यते जनैः । | ||
| राजवृक्षः | Rājavṛkṣaḥ | वृक्षाणां राजा, सुमनःशेखरत्वात्, रोगराजं वृश्चति छिनत्ति वा, ‘ओव्रश्चू छेदने’ । | ||
| व्याधिघातः | Vyādhighātaḥ | व्याधीन् हन्ति । | ||
| शम्पाकः | Śampākaḥ | स्वर्णवर्णान्यङ्गानि पुष्पाण्यस्य | ||
| स्वर्णाङ्गः | Svarṇāṅgaḥ | स्वर्णवर्णान्यङ्गानि पुष्पाण्यस्य । |
Classifications
| Name | उपयोगी हिस्सा(हिन्दी) | Part Used(Diacritical) | Title (Ref. Book) | Reference Remarks |
|---|---|---|---|---|
| Flower/ inflorescence | पुष्प | Puṣpa | ||
| Fruit pulp | फलमज्जा | Phalamajjā | ||
| Leaf | पत्र | Patra | ||
| Stem bark /root bark | त्वक् | Tvak |
| Name | गण(हिन्दी) | Gana(Diacritical) | Title (Ref. Book) | Reference Remarks |
|---|---|---|---|---|
| आरग्वधादिगण | Āragvadhādigaṇa | Aragvadhadigana | ||
| श्यामादिगण | Śyāmādigaṇa | Shyamadigana |
| Name | महाकषाय (हिन्दी) | Mahakashaya(Diacritical) | Title (Ref. Book) | Reference Remarks |
|---|---|---|---|---|
| Kandughna Mahakashaya | कण्डूघ्न महाकषाय | Kaṇḍūghna mahākaṣāya | ||
| Kushthaghna Mahakashaya | कुष्ठघ्न महाकषाय | Kuṣṭhaghna mahākaṣāya |
| Name | वर्ग(हिन्दी) | Varga(Diacritical) | Title (Ref. Book) | Reference Remarks |
|---|---|---|---|---|
| Abhayadivarga | अभयादिवर्ग | Abhayādivarga | ||
| Guduchyadivarga | गुडूच्यादिवर्ग | Guduchyadivarga | ||
| Haritakyadivarga | हरीतक्यादिवर्ग | Harītakyādivarga | ||
| Oshadhivarga | ओषधिवर्ग | Oṣadhivarga | ||
| Prabhadradivarga | प्रभद्रादिवर्ग | Prabhadrādivarga |
| Name | स्कंध(हिन्दी) | skandha(Diacritical) | Title (Ref. Book) | Reference Remarks |
|---|---|---|---|---|
| Tiktaskandha | तिक्तस्कन्ध | Tiktaskandha |
Properties
| Name | रस (हिन्दी) | Rasa (Diacritical) | Title (Ref. Book) | Author (Ref. Book) | Publisher (Ref. Book) | Reference Remarks |
|---|---|---|---|---|---|---|
| Madhura/Svadu | मधुर/स्वादु | Madhura/Svādu |
| Name | गुण(हिन्दी) | Guna(Diacritical) | Title (Ref. Book) | Reference Remarks |
|---|---|---|---|---|
| Mridu | मृदु | Mṛdu | ||
| Snigdha | स्निग्ध | Snigdha | ||
| Guru | गुरु | Guru |
| Name | विर्य (हिन्दी) | Virya (Diacritical) | Title (Ref. Book) | Reference Remarks |
|---|---|---|---|---|
| Shita Virya | शीत वीर्य | Śīta vīrya |
| Name | विपाक (हिन्दी) | Vipaka(Diacritical) | Title (Ref. Book) | Reference Remarks |
|---|---|---|---|---|
| Madhura vipaka | Madhura vipāka | मधुर विपाक |
| Name | कर्म (हिन्दी) | Karma (Diacritical) | Title (Ref. Book) | Reference Remarks |
|---|---|---|---|---|
| Anulomana | अनुलोमन | anulomana | ||
| Hridya/ Hridayam (Saumanasyakara) | हृद्य/ हृदयं (सौमनस्यकर) | hṛdya/ hṛdayaṃ (saumanasyakara) | ||
| Jvarahara | ज्वरहर | jvarahara | ||
| Kushthaghna/ Kushthahara | कुष्ठघ्न/ कुष्ठहर | kuṣṭhaghna/ kuṣṭhahara | ||
| Raktashodhaka/ Raktadoshanashaka/ Raktadoshahara | रक्तशोधक/ रक्तदोषनाशक/ रक्तदोषहर | raktaśodhaka/ raktadoṣanāśaka/ raktadoṣahara | ||
| Shothahara/ Shophaghna/ Shothaghna/ Shvayathuhara | शोथहर/ शोफघ्न/शोथघ्न/ श्वयथुहर | śothahara/ śophaghna/śothaghna/ śvayathuhara | ||
| Vedanasthapana | वेदनास्थापन | vedanāsthāpana | ||
| Vatahara | वातहर | vātahara | ||
| Pittahara/Pittashamaka | पित्तहर/पित्तशामक | pittahara/pittaśāmaka | ||
| Shodhaka | शोधक | śodhaka |
| Name | दोषकर्म (हिन्दी) | Doshakarma (Diacritical) | Title (Ref. Book) | Reference Remarks |
|---|---|---|---|---|
| Vatapittahara/Vatapittashamana/ Vatapittashamana | वातपित्तहर/वातपित्तशमन/ वातपित्तशमन | Vātapittahara/Vātapittaśamana/ Vātapittaśamana |
Usage
| Name | Dosage(Form) | Dosage(Reference) | Title (Ref. Book) | Reference Remarks |
|---|---|---|---|---|
| Aragvadhadi Kvatha Churna | Kvatha Churna/Kashaya Churna | Ayurvedic Formulary of India (AFI), Part I, 4:4 | ||
| Kushtharakshasa Taila | Taila | Ayurvedic Formulary of India (AFI), Part I, 8:9 | ||
| Somaraji Taila/Bakuchi Taila | Taila | Ayurvedic Formulary of India (AFI), Part I, 8:61 | ||
| Rasnasaptaka Kvatha Churna/Rasnasaptaka Kashaya Churna | Kvatha Churna/Kashaya Churna | Ayurvedic Formulary of India (AFI), Part II, 4:20 |
| Name | Title (Ref. Book) | Reference Remarks |
|---|---|---|
| Granthisotha | ||
| Śotha | ||
| āmavātaḥ | ||
| aruciḥ | ||
| Kāsa | ||
| raktapittam | ||
| Daha | ||
| Udarshool | ||
| Mutrakrichha | ||
| jvaraḥ | ||
| kamla |
Dose
| Name | Title (Ref. Book) | Reference Remarks |
|---|---|---|
| Kvath/ Decoction-50-100ml |
Pharmacopoeial Status
| Name | Title (Ref. Book) | Reference Remarks |
|---|---|---|
| The Ayurvedic Pharmacopoeia of India, Part- I, Vol.-I, Pg. No.-7(Fruits Pulp) | ||
| The Ayurvedic Pharmacopoeia of India, Part- I, Vol.-V, Pg. No.-8(Stem bark) |
Classical Verses Related to Therapeutic Indications
| Vyadhi / Diseases | Context / Formulation | Shloka / Verse | Reference |
|---|---|---|---|
| ज्वर | आरग्वघं वा पयसा मृद्वीकानां रसेन वा। त्रिवृतां त्रायमाणां वा पयसा ज्वरित: पिबेत्॥ | (च. चि. ३. २३२) | |
| ज्वरहद्रोगवातासृगदावर्तादिरोगिषु । राजवृक्षोऽधिकं पथ्यो मृदुर्मधुरशीतल:॥ बाले वृद्दे क्षते क्षीणे सुकुमारे च मानवे॥ योज्यो मृद्वनपायित्वाद् विशेषाच्चतुरंगुल:॥ | (च. क. ८. ४-५) | ||
| कामला | आरग्वधं रसेनेक्षोर्विदार्यामलकस्य वा। सत्र्यूषणं बिल्वमात्रं पाययेत् कामलापहम्॥ | (आ. ह्र. चि. १६. ४१) | |
| प्रमेह | हरिद्रामोहिनं राजवृक्षकषायम्॥ | (सु. चि. ११. ९) | |
| कुष्ठ | पर्णानि पिष्ट्वा चतुरंगुलस्य तक्रेण पर्णान्यथ काकमाच्या:। तैलाक्तगात्रस्य नरस्य कुष्ठान्युद्वर्तयेदश्वहनच्छदैश्र्च॥ | (च. सू ३. १७) | |
| कुष्ठ | दार्व्या रसाञ्जानस्य च निम्बपटोलस्य खदिरसारस्य। आरग्वधवृक्षकयोस्त्रिफलाया: सप्तपर्णस्य। इति षट् कषाययोगा: कुष्ठघ्ना सप्तमश्र्च तिनिशस्य॥ स्नाने पाने च हितस्तथाऽष्टमश्र्चशवमारस्य॥ | (च. चि. ७. ९७-९८) | |
| कुष्ठ | आरग्वधस्य मूलेन शतकृत्व: श्रृतं घृतम्॥ पिबेत् कुष्ठं जयत्थाशु भजन् सखदिरं जलम्॥ | (अ. ह्र. चि १९. १३) | |
| कुष्ठ | आरग्वधस्य पत्राणि आरनालेन पेषयेत्॥ दद्रुकिटिभकुष्ठानि हन्ति सिध्मानमेव च॥ | (वृ. मा. ४९. ९; बं से. कुष्ठ ६३) | |
| गण्डमाला | आरग्वधशिफां क्षिप्रं सम्यक् तण्डुलवारिणा। पिष्ट्वा नस्यप्रलेपाभ्यां गण्डमालां समुद्दरेत॥ | (वृ. मा. ४१. २३) | |
| व्रण | आरग्वधनिशाकालाचूर्ण मधुघृताप्लतम्॥ अग्रवर्तिप्रणिहितं व्रणानां शोधनं हितम्॥ | (सु. चि. ८. ३०) | |
| आमवात | आरग्वधस्य पत्राणि भृष्टानि कटुतैलत:। आमघ्नानि नर: कुर्यात् सायं भक्तावृतानि च। | (भां प्र. चि. २६. ५२) | |
| विसर्प | आरग्वधस्य पत्राणि त्वचं श्र्लेष्मातक्स्य् च। पृथगालेपनं कुर्याद् द्वन्द्वश: सर्वशोऽपि वा। प्रदेहा: सर्व एवैते देया: स्वल्पघृताप्लता:॥ | (च. चि. २१, ८१-९२) | |
| ऊरुस्तम्भ | शाकैरलवणैर्दघाज्जलतैलोपसाधितै:। सुनिषण्णकनिम्बार्कवेत्रारग्वधपल्लवै:॥ | (च. चि. २७. २६) | |
| पित्तोदर | ……………………….विरेचयेत्॥ पयसा सत्रिवृतकल्केनोरुबूकश्रृतेन वा। सातलात्रायमाणभ्यां श्रृतेनारग्वधेन वा॥ | (च. चि. १३. ६१-७०) | |
| उपदंश | ………………………..शम्याकानां पृथक पृथक। मूलेन परिपिष्टेन वारिणा…………………….॥ करवीरय पत्राणि जात्यारग्वधयोस्तथा॥ प्रक्षालने प्रयोज्यानि वैजयन्त्यर्कयोरपि॥ | (सु. चि. १९ ३९) | |
| सघोव्रणे किक्किसे च | अकिञ्चनानामहिपस्य पत्रं स्तन्येन संपेष्य समर्पयेद द्राक्। सघोव्रणे रोपणमाशु वाञ्छन् कल्कञ्च दघादथ किक्किसस्य ॥ | (वै. म. १६. १२९) |
Classical Verse From Nighantu
| Source | Varga | Verse |
|---|---|---|
| कैयदेवनिघण्टु | ओषधिवर्ग | आरग्वधो दीर्घफलो व्याधिघातो नराधिपः | आरेवतो राजवृक्षः शम्पाकः चतुरङ्गुलः ||९४२|| प्रग्राहो रैवतः कर्णा कर्णिकारोऽपघातकः | आरोग्यशिम्बी कल्पद्रुः स्वर्णद्रुः कृतमालकः ||९४३|| आरग्वधो हिमस्तिक्तो मधुरो मृदुरेचनः | गुरुर्दोषत्रयहरो ज्वरगुल्मोदरापहः ||९४४|| शूलोदावर्तहृद्रोगव्रणकच्छूप्रमेहनुत् | पत्रमारग्वधस्यापि कफमेदोविशोषणम् ||९४५|| विरेके सततं पथ्यं मलदोषसमन्विते | कुसुमं शिशिरं स्वादु कषायं ग्राहि तिक्तकम् ||९४६|| तत्फलं संस्रनं रुच्यं कुष्ठपित्तकफापहम् | ज्वरे तु सततं पथ्यं कोष्ठशुद्धिकरं परम् ||९४७|| तन्मज्जा स्वादुपाकोऽग्निकृत् स्निग्धोऽनिलपित्तहा |९४८| |
| धन्वन्तरिनिघण्टु | गुडूच्यादिवर्ग | आरग्वधो दीर्घफलो व्याधिहा चतुरङ्गुलः | आरेवतस्तथा कर्णी कर्णिकारोऽथ रेचनः ||२४७|| आरग्वधो रसे तिक्तो गुरूष्णः कृमिशूलनुत् | कफोदरप्रमेहघ्नः कृच्छ्रगुल्मत्रिदोषजित् ||२४८|| |
| भावप्रकाशनिघण्टु | हरीतक्यादिवर्ग | आरग्वधो राजवृक्षः शम्पाकश्चतुरङ्गुलः | आरेवतो व्याधिघातः कृतमालः सुवर्णकः | कर्णिकारो दीर्घफलः स्वर्णाङ्गः स्वर्णभूषणः ||१३१|| आरग्वधो गुरुः स्वादुः शीतलः स्रंसनोत्तमः | ज्वरहृद्रोगपित्तास्रवातोदावर्तशूलनुत् ||१३२|| तत्फलं स्रंसनं रुच्यं कुष्ठपित्तकफापहम् | ज्वरे तु सततं पथ्यं कोष्ठशुद्धिकरं परम् ||१३३|| |
| मदनपालनिघण्टु | अभयादिवर्ग | आरग्वधो राजवृक्षः शम्याकः कृतमालकः | व्याधिघातः कर्णिकारः प्रग्रहश्चतुरङ्गुलः ||१२३|| आरोग्यशिम्बी स्वर्णागः कर्णो दीर्घफलो मतः | कुण्डली हेमपुष्पा च करिव्याधो नृपद्रुमः ||१२४|| स्वर्णशेफालिका श्यावा कुष्ठसूदननाम तत् | स्वर्णस्थाल्पा पित्तला च सुवर्णद्रुम ईरितः ||१२५|| आरग्वधो गुरुः स्वादुः शीतलो मृदुरेचनः | ज्वरहृद्रोगपित्तास्रवातोदावर्तशूलजित् ||१२६|| तत्पुष्पं वातलं ग्राहि तिक्तं पित्तकफापहम् | तन्मज्जा मधुरः पाके तिक्तः पित्तसमीरनुत् ||१२७|| |
| राजनिघण्टु | प्रभद्रादिवर्ग | आरग्वधोऽन्यो मन्थानो रोचनश्चतुरङ्गुलः | (अरिवतो दीर्घफलो व्याधिघातो नृपद्रुमः) ||४४|| हेमपुष्पो राजतरुः कण्डूघ्नश्च ज्वरान्तकः | अरुजः स्वर्णपुष्पश्च स्वर्णद्रुमः कुष्ठसूदनः ||४५|| कर्णाभरणकः प्रोक्तो महाराजद्रुमः स्मृतः | कर्णिकारो महाद्रिः स्यात्प्रोक्तश्चैकोनविंशतिः ||४६|| आरग्वधोऽतिमधुरः शीतः शूलापहारकः | ज्वरकण्डूकुष्ठमेहकफविष्टम्भनाशनः ||४७|| |
| सोढलनिघण्टु | गुडूच्यादिवर्ग | कर्णिकारो राजवृक्षः प्रग्रहः कृतमालकः ||२३६|| आरोग्यशिम्बः शम्याकौ व्याधिघातो व्यथान्तकः | आरग्वधो दीर्घफल आमहा चतुरङ्गुलः ||२३७|| आरेवतस्तथा पर्णी स्वर्णस्थाली च रैवतः | कुण्डली हेमपुष्पश्च करिव्याधो ज्वरापहः ||२३८|| स्वर्णशेफालिका कोकः स्वर्णवृक्षो द्रुमोत्पलः |२३९| |